राय कृष्णदास का जीवन परिचय by आलोक वर्मा

राय कृष्णदास

राय कृष्णदास आधुनिक हिन्दी साहित्य में गच्च – गीत प्रवर्तक माने जाते हैं । आपने अपने साहित्य में आत्मा तथा परमात्मा की मोहक प्रेम – क्रीड़ाओं का अद्वितीय चित्रण किया है । राय कृष्णदास अपने । गद्य – काव्यों के क्षेत्र में पयप्ति यश प्राप्त कर चुके हैं । आपके गद्य गीतों में पद्य की भाँति तक तो नहीं . लेकिन लय और संगीत विद्यमान है । आत्मा और प्रकृति का सौन्दर्य आपके गद्य – गीतों में सर्वत्र बिखरा दिखाई देता है । ये गीत सरल , सुगम और आकार में छोटे हैं , तथा काव्य जटिलता राय कष्णदास जी का जन्म काशी के प्रसिद्ध राय परिवार में सन् 1892 ई० में हआ था । आपके पिता राय प्रहलाददास , राय भारतेन्दु जी के सम्बन्धी तथा काव्य – कला प्रेमी थे । आपका परिवार कला , संस्कृति और साहित्य और साहित्य प्रेम के लिए प्रसिद्ध था । इस प्रकार राय साहब को हिन्दी – प्रेम विरासत में प्राप्त हुआ । आप बचपन में जब आठ वर्ष के थे , तभी से कविता करने लगे । जब आप 12 वर्ष के थे तभी आपके पिता का स्वर्गवास हो गया , अत : आपकी स्कूली शिक्षा अधिक नहीं हो पायी । उत्कट ज्ञान लिप्सा होने के कारण आपने घर पर ही स्वाध्याय से संस्कृत , अंग्रेजी , हिन्दी तथा बँगला का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया । आपकी साहित्यिक रुचि के विकास में काशी का वातावरण प्रेरक रहा । साहित्यिक गतिविधियों में रुचि होने के कारण आपकी घनिष्ठता , जयशंकर प्रसाद , आचार्य रामचन्द्र शुक्ल , मैथिलीशरण गुप्त आदि प्रमुख कवियों तथा आलोचकों से हो गयी । भारतीय कला – आन्दोलन में राय साहब का अप्रतिम स्थान है । आपने अपने ही व्यय से उच्चकोटि । के ‘ कला – भवन ‘ की स्थापना की , जो अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक विभाग है । इस संग्रहालय की गणना संसार के प्रमुख संग्रहालयों में की जाती है । आपने प्राचीन भारतीय कला , इतिहास और संस्कृति को प्रकाश में लाने का भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया । सन् 1981 ई० में आप इस नश्वर देह को त्याग कर ब्रह्म में लीन हो गये राय साहब ने परम्परागत ब्रजभाषा में कविताएँ लिखी जो ‘ ब्रजरज ‘ में संग्रहीत हैं । आपके भावक ‘ नामक खड़ी बोली काव्य – संग्रह पर छायावाद का स्पष्ट प्रभाव है । आपके गद्यगीत साधना । और कायापथ के नाम से प्रासद्ध है । आप पुरातत्व के पण्डित तथा प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति के रूप में भी प्रतिष्ठित है । आपने भारतीय कलाओं का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत किया ।

By आलोक वर्मा

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