रामवृक्ष बेनीपुरी का जीवन परिचय by आलोक वर्मा

रामवृक्ष बेनीपुरी

रामवृक्ष बेनीपुरी की गड़ना महान् लेखकों में की जाती है । आपका लिखा गया प्रशस्त करते है । आप बहमुखी प्रतिभा से पकाहा है । समाजसेवी एवं राजनीतिज्ञ के रामवृक्ष बेनीपुरी रामवृक्ष बेनीपुरी की गणना हिन्दी साहित्य के महान लेखकों में की जाती है । आपका प्रत्येक शब्द व वाक्य क्रान्ति के क्षेत्र में एक नवीन मार्ग प्रशस्त कर है । आप बहुमुखा । मण्डित थे । रखाचित्र का महत्वपूर्ण स्थान देने का श्रेय आपको ही है । समाजसेवी एव राज माते आपने जो कुछ लिखा है , वह स्वतन्त्र भाव से लिखा है । रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपर जिले के बेनीपर नामक ग्राम में जनवरा , सन 1902 में हुआ था । आपके पिता श्री फूलवन्तसिंह एक साधारण किसान थे । बाल्यावस्था में हा आपके माता – पिता की छत्र – छाया आपके सिर से उठ गई थी तथा आपका लालन – पालन आपकी मौसी ने किया था । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा बेनीपर में ही हुई थी बाद में अपनी ननिहाल में भा । पढ़े । मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने से पूर्व ही सन् 1920 में आपने पढ़ाई छोड़ दी और गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पडे । मात्र अठारह वर्ष की आयु में आप स्वतन्त्रता सैनिक बन गये । स्वाध्याय के बल पर ही आपने हिन्दी साहित्य की ‘ विशारद ‘ परीक्षा उत्तीर्ण की । स्वतन्त्रता के इस महान् पुजारी ने अपने निबन्धों एवं लेखों के द्वारा मनुष्यों के हृदय में देशभक्ति की भावना का संचार किया । आप राष्ट्रसेवा के साथ – साथ साहित्य साधना भी करते रहे । देश – सेवा के परिणामस्वरूप आपको अनेक बार जेल यातनाएँ भी सहन करनी पड़ी । स्वतन्त्रताप्राप्ति के पश्चात् देश में पद और मान पाने की जो होड़ लगी उसे दोकर काफी हृदय विचलित हो उठता था । स्वतन्त्रता और साहितय के इस प्रेमी ने सन् 1968 में चिरनिद्रा को वरण किया । बाल्यावस्था से ही बेनीपुरी जी की साहित्य लेखन में अभिरुचि थी । पन्द्रह वर्ष की अल्पायु से ही आप पत्र – पत्रिकाओं के लिए लिखने लगे थे । पत्रकारिता से ही आपकी साहित्य साधना का श्रीगणेश हुआ था । कारागारवास में भी आपने साहित्य साधना को बनाये रखा । आपने बालक , तरुण भारती . मित्र , किसान , योगी , हिमालय तथा जनता आदि पत्र – पत्रिकाओं का सफल सम्पादन किया । आपने उत्कृष्ट कोटि का साहित्य सृजन किया । आपकी रचनाओं के विषय देशभक्ति , भारतीय संस्कृति तथा समाज – निर्माण हैं । आपके गद्य साहित्य में गहन अनुभूतियों एवं उच्च कल्पनाओं की स्पष्ट झाँकी मिलती है । गद्य साहित्य की उपन्यास , नाटक , कहानी , संस्मरण , निबन्ध , रेखाचित्रों आदि के लिए । आप सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं । आपके सम्पूर्ण साहित्य को ‘ बनीपुरी ग्रन्थावली ‘ के नाम से दस खण्डों में प्रकाशित करने की योजना थी , जिसके दो खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं । निबन्धों और रेखाचित्रों के लिए आपको अत्यधिक ख्याति प्राप्त हुई । वस्तुतः आप उत्कृष्ट कोटि के अप्रतिम साहित्यकार थे ।

आपकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित है

रेखाचित्र – माटी की मूरतें , लाल तारा आदि । संस्मरण – जंजीरें और दीवार , तथा मील के पत्थर । निबन्ध – गेहूँ बनाम गुलाब , मशाल आदि । कथा साहित्य – पतितों के देश में ( उपन्यास ) तथा चिता के फूल ( कहानी ) । जीवनी – महाराणा प्रतापसिंह , कार्ल मार्क्स , जयप्रकाश नारायण । नाटक – अम्बपाली , सीता की माँ , रामराज्य आदि । यात्रा वृत्तान्त – पैरों में पंख बाँधकर एवं उड़ते चलें । आलोचना – विद्यापति पदावली एवं सुबोध टीका आपकी आलोचनात्मक कृतियाँ हैं । सम्पादन – तरुण भारती , बालक , युवक , किसान , मित्र , कैदी , योगी , जनता , चुन्नू – मुन्नू , तूफान।

By आलोक वर्मा

राहल सांकृत्यायन का जीवन परिचय by आलोक वर्मा

राहुल सांकृत्यायन

राहल सांकृत्यायन हिन्दी साहित्य की अद्वितीय विभूति हैं तथा आप हिन्दी कम है । आपका जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में पन्दढा नामक ग्राम में अपने नाना ५० 1893 ई० में हुआ था । आपके पिता पं० गोवर्द्धन पाण्डे , कनेला ग्राम में रहते थे । वे कट्टर धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे । राहलजी का बचपन का नाम केदारनाथ था । संकृति गोत्र होने के कारण आप सांकृत्यायन कहलाये । बौद्ध धर्म में आस्था होने के कारण आपने अपना नाम बदलकर राहुल रख लिया तथा आप राहल सांकृत्यायन इस नाम से प्रसिद्ध हए । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा रानी की सराय और निजामाबाद में हुई । आपने सन् 1907 ई० में उर्दू मिडिल पास की । आपके पिता की तीव्र इच्छा थी कि आप आगे भी पढाई करें परन्त बौद्ध धर्म में आस्था हो जाने के कारण आपका मन अध्ययन से विरत हो गया । आपके नाना सेना में सिपाही रहे थे । उनके मुख से दक्षिण भारत की यात्रा के अनुभव सुन कर आप के मन में घूमने की इच्छा बलवती होती चली गयी । तत्पश्चात् उन्होंने तिब्बत , सम्पूर्ण भारत , एशिया , युरोप सोवियत भूमि और लंका की भूमि पर यात्राएँ करते हुए अपना जीवन बिताया । बाद में धुमक्कड़ों के निर्देशन के लिए आपने ‘ घुमक्कड़ शास्त्र ‘ लिख डाला । आपने कभी विधिवत् शिक्षा ग्रहण नहीं की थी । विद्यालय में तो आपने प्रवेश ही नहीं लिया था । अपने घूमने के अनुभव पर ही आपने अपने साहित्य की सर्जना की तथा हिन्दी की अथक् सेवा करते हुए 14 अप्रैल , सन् 1963 ई० को आपने महाप्रस्थान ( मृत्यु ) किया । राहुलजी को साहित्य लिखने की प्रेरणा , पालि साहित्य और संस्कृत के अध्ययन से ही प्राप्त हुई । आपने पाँच बार तिब्बत , लंका और सोवियत भूमि की यात्रा की थी और बौद्ध साहित्य का अध्ययन किया तथा उस ज्ञान को विभिन्न रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया । वे एशिया और यूरोप की छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता थे । आपने कहानी , नाटक , उपन्यास , यात्रावृत्त , निबन्ध , आत्मकथा , जीवनी , साहित्यालोचन , राजनीति और इतिहास आदि विषयों पर लगभग 150 ग्रन्यों की रचना की है

राहुलजी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

यात्रा साहित्य – मेरी तिब्बत यात्रा , मेरी यूरोप यात्रा , लंका , मेरी लद्दाख यात्रा , रूस में पच्चीस मास , जापान , ईरान , घुमक्कड़शास्त्र एवं मंगोलिया सम्बन्धी यात्रा वृत्तान्त । कहानी संग्रह – वोल्गा से गंगा ( संग्रह ) , कनैला की कथा , सतमी के बच्चे , बहुरंगी मधुपरी आदि । उपन्यास – जय यौधेय , दिवोदास , सिंह सेनापति , विस्मृत यात्री , मधुर स्वप्न , सप्तसिन्धु आदि । जीवनी – महामानव बुद्ध , कार्ल मार्क्स , लैनिन , स्टालिन , सरदार पृथ्वीसिंह , नये भारत के नये नेता , असहयोग के मेरे साथी , वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली , आदि । आत्मकथा – मेरी जीवन – यात्रा । साहित्यालोचन – हिन्दी काव्यधारा , दक्खिनी हिन्दी धारा । धर्म और दर्शन – बौद्ध दर्शन

By आलोक वर्मा

राय कृष्णदास का जीवन परिचय by आलोक वर्मा

राय कृष्णदास

राय कृष्णदास आधुनिक हिन्दी साहित्य में गच्च – गीत प्रवर्तक माने जाते हैं । आपने अपने साहित्य में आत्मा तथा परमात्मा की मोहक प्रेम – क्रीड़ाओं का अद्वितीय चित्रण किया है । राय कृष्णदास अपने । गद्य – काव्यों के क्षेत्र में पयप्ति यश प्राप्त कर चुके हैं । आपके गद्य गीतों में पद्य की भाँति तक तो नहीं . लेकिन लय और संगीत विद्यमान है । आत्मा और प्रकृति का सौन्दर्य आपके गद्य – गीतों में सर्वत्र बिखरा दिखाई देता है । ये गीत सरल , सुगम और आकार में छोटे हैं , तथा काव्य जटिलता राय कष्णदास जी का जन्म काशी के प्रसिद्ध राय परिवार में सन् 1892 ई० में हआ था । आपके पिता राय प्रहलाददास , राय भारतेन्दु जी के सम्बन्धी तथा काव्य – कला प्रेमी थे । आपका परिवार कला , संस्कृति और साहित्य और साहित्य प्रेम के लिए प्रसिद्ध था । इस प्रकार राय साहब को हिन्दी – प्रेम विरासत में प्राप्त हुआ । आप बचपन में जब आठ वर्ष के थे , तभी से कविता करने लगे । जब आप 12 वर्ष के थे तभी आपके पिता का स्वर्गवास हो गया , अत : आपकी स्कूली शिक्षा अधिक नहीं हो पायी । उत्कट ज्ञान लिप्सा होने के कारण आपने घर पर ही स्वाध्याय से संस्कृत , अंग्रेजी , हिन्दी तथा बँगला का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया । आपकी साहित्यिक रुचि के विकास में काशी का वातावरण प्रेरक रहा । साहित्यिक गतिविधियों में रुचि होने के कारण आपकी घनिष्ठता , जयशंकर प्रसाद , आचार्य रामचन्द्र शुक्ल , मैथिलीशरण गुप्त आदि प्रमुख कवियों तथा आलोचकों से हो गयी । भारतीय कला – आन्दोलन में राय साहब का अप्रतिम स्थान है । आपने अपने ही व्यय से उच्चकोटि । के ‘ कला – भवन ‘ की स्थापना की , जो अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक विभाग है । इस संग्रहालय की गणना संसार के प्रमुख संग्रहालयों में की जाती है । आपने प्राचीन भारतीय कला , इतिहास और संस्कृति को प्रकाश में लाने का भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया । सन् 1981 ई० में आप इस नश्वर देह को त्याग कर ब्रह्म में लीन हो गये राय साहब ने परम्परागत ब्रजभाषा में कविताएँ लिखी जो ‘ ब्रजरज ‘ में संग्रहीत हैं । आपके भावक ‘ नामक खड़ी बोली काव्य – संग्रह पर छायावाद का स्पष्ट प्रभाव है । आपके गद्यगीत साधना । और कायापथ के नाम से प्रासद्ध है । आप पुरातत्व के पण्डित तथा प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति के रूप में भी प्रतिष्ठित है । आपने भारतीय कलाओं का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत किया ।

By आलोक वर्मा

डॉ० सम्पूर्णानन्द का जीवन परिचय by आलोक वर्मा

डॉ० सम्पूर्णानन्द

डॉ० सम्पूर्णानन्द गम्भीर एवं उदात्त साहित्य सजन के लिए विख्यात हैं । आप कुशलर सहृदय साहित्यकार , भारतीय संस्कृति के अध्येता एवं दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान् थे । डा० सा जी राष्ट्र के प्रति समर्पित सुविख्यात साहित्यिक – मनीषी थे । आप एक उद्भट विद्वान थे डॉ० सम्पूर्णानन्द का जन्म 1 जनवरी , 1890 को काशी में एक संभ्रान्त कायस्थ परिवार में हुआ । था । आपके पिता श्री विजयानन्द बड़े धार्मिक व्यक्ति थे . जिनका आपके ऊपर पूरा प्रभाव पड़ा । आपन क्वीन्स कॉलेज बनारस से बी०एस – सी० की परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रयाग ट्रेनिंग कॉलेज से एल०टी० की परीक्षा उत्तीर्ण की । आपने एक अध्यापक के रूप में जीवन में प्रवेश किया और सर्वप्रथम प्रेम महाविद्यालय , वृन्दावन में अध्यापन कार्य किया । कुछ समय पश्चात् आपकी नियुक्ति इंगर कॉलेज , बीकानेर में प्राचार्य के पद पर हुई । सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रेरित होकर आप भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े । आप अनेक बार जेल भी गए । स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् आप उत्तर प्रदेश के गृहमन्त्री , शिक्षामन्त्री तथा मुख्यमन्त्री भी रहे । इसके उपरान्त सन् 1962 ई० में राजस्थान प्रदेश के राज्यपाल नियुक्त किए गए । इसके बाद 10 जनवरी , 1969 ई० को काशी में ही आपने अपने भौतिक शरीर का परित्याग किया । डॉ० सम्पूर्णानन्द का हिन्दी के प्रति बचपन से ही अनुराग था । आपने उत्कृष्ट रचनाएं लिखकर हिन्दी साहित्य के भण्डार की अभिवृद्धि की । सन् 1940 ई० में आप अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति चुने गए । हिन्दी साहितय सम्मेलन ने ‘ समाजवाद ‘ कृति पर आपको मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया था । आपको सम्मेलन की सर्वोच्च उपाधि ‘ साहित्य वाचस्पति से भी सम्मानित किया गया । काशी नागरी प्रचारिणी सभा के आप अध्यक्ष और संरक्षक भी रहे । वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय आपकी ही देन है ।

डॉ० सम्पूर्णानन्द की प्रसिद्ध कृतियाँ निम्नलिखित हैं

इतिहास – आर्यों का आविदेश , सम्राट हर्षवर्द्धन , काशी का विद्रोह , भारत के देशी राज्य , आदि । राजनीति – चीन की राज्य क्रान्ति , समाजवाद , अन्तर्राष्ट्रीय विधान , मिस्र की राज्य क्रान्ति आदि । जीवनी – देशबन्धु चितरंजनदास , महात्मा गांधी । ज्योतिष – सप्तर्षि – मण्डल । धर्म – गणेश , ब्राह्मण सावधान , नारदीय सूक्ति टीका आदि । निबन्ध – भाषा की शक्ति ।

डॉ० सम्पूर्णानन्द गंभीर विचारक एवं प्रौढ़ लेखक थे । आपकी रचनाओं में आपके व्यक्तित्व और पाण्डित्य की झलक मिलती है । आपने तत्सम शब्दावली से युक्त खड़ी बोली में ही साहित्य सृजन किया । आपकी भाषा गम्भीर , प्रवाहयुक्त तथा सौष्ठव से युक्त है ।

By आलोक वर्मा

सरदार पूर्णसिंह का जीवन परिचय by आलोक वर्मा

सरदार पूर्णसिंह

सरदार पूर्णसिंह , द्विवेदी युग के श्रेष्ठ तथा सफल निबन्धकार हैं । अध्यापक पूर्णासह हवा साहित्य के प्रचार – प्रसार के अद्वितीय उत्थान के निबन्धकार हैं । उन्होंने भावात्मक एव शैली के निबन्धों की रचना करके इस क्षेत्र में एक नयी परम्परा का सूत्रपात किया । आपन मात्र छः निबन्ध लिखकर ही हिन्दी के निबन्धकारों में अपना उच्चकोटि का स्थान बनाया । आपका जन्म 17 फरवरी , सन् 1881 ई० में ऐबटाबाद ( पंजाब ) जिले के सलहड़ नामक ग्राम में हुआ था । अपनी माता के सात्विक और धर्मपरायण जीवन ने बालक पूर्णसिंह को अति प्रभावित किया । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा रावलपिण्डी में हुई । हाईस्कूल करने के बाद आप लाहौर चले गए । लाहौर से इण्टरमीडिएट – परीक्षा उत्तीर्ण करके आप रसायनशास्त्र का विशेष अध्ययन करने हेतु जापान चले गये । वहाँ आपकी भेंट स्वामी रामतीर्थ से हुई । स्वामीजी से प्रभावित होकर आपने संन्यास ले लिया और उन्हीं के साथ भारत लौट आये । बाद में आपने अपनी गृहस्थी भी बसाई और देहरादून के फोरेस्ट इंस्टीट्यूट में नौकरी कर ली । स्थिति अनुकूल न होने के कारण आपने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और ग्वालियर चले आये । ग्वालियर में भी आपका मन नहीं लगा अतः आप पंजाब चले आये , खेती – बाड़ी करने लगे । 31 मार्च , सन् 1931 को मात्र पचास वर्ष की आयु में आप इस संसार से विदा हुए । सरदार पूर्णसिंह की मातृभाषा पंजाबी थी परन्तु राष्ट्र – भाषा हिन्दी से आपको विशेष स्नेह था ; अतः आपने हिन्दी में उच्चकोटि के निबन्धों की रचना की । आपने अपनी मौलिक विचारधारा एवं व्यंजनापूर्ण शैली में केवल छ : निबन्धों की रचना की । निबन्ध लेखन हेतु आपने मुख्य रूप से नैतिक विषयों को ही लिया । आपने जो भी लिखा है वह भाव और अनुभूति की दृष्टि से लिखा है जो सजीव एवं लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण है ।

आपकी गद्य रचनाएँ बहुत कम हैं किन्तु अतिविशिष्ट हैं ।

आपके निबन्ध इस प्रकार हैं – ( 1 ) मजदूरी और प्रेम , ( 2 ) आचरण की सभ्यता , ( 3 ) सच्ची वीरता , ( 4 ) अमेरिका का मस्त योगी बॉल्ट हिटमैन , ( 5 ) कन्यादान , तथा ( 6 ) पवित्रता । सरदार पूर्णसिंह की भाषा शुद्ध एवं साहित्यिक खड़ी बोली है । आपके साहित्य में उर्दू – फारसी के शब्दों का प्रयोग प्रचूर मात्रा में हआ है । आपने अपने निबन्धों में विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया है । आपकी भाषा में एक गति है , प्रवाह है , सौन्दर्य है एवं हृदय और मस्तिष्क को बाँध लेने

डॉ० श्यामसुन्दर दास का जीवन परिचय by आलोक वर्मा

डॉ० श्यामसुन्दर दास

डॉ० श्यामसुन्दर दास हिन्दी साहित्याकाश के ऐसे नक्षत्र हैं , जिन्होंने अपने प्रकाश से साहित्य को उज्ज्वल कर दिया । द्विवेदी युग के विषयों के विवेचन का कार्य सर्वप्रथम बाबू श्यामसुन्दरदास जी ने आरम्भ किया । आपने हिन्दी साहित्य के विकास में अतुलनीय योगदान दिया । आप द्विवेदी युग के श्रेष्ठ निबन्धकार थे ।

डॉ० श्यामसुन्दर दास का जन्म काशी के एक पंजाबी खत्री परिवार में सन् 1875 ई० को हुआ था । आपके पिताजी का नाम श्री देवीदास खन्ना था । आपने प्रयाग विश्वविद्यालय से बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की । बी०ए० उत्तीर्ण करने के बाद आपको सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज में अध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया । तत्पश्चात् आपकी नियुक्ति लखनऊ के कालीचरण हाईस्कूल में प्रधानाचार्य पद पर हुई । इन्हीं दिनों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की स्थापना हुई तथा आपने वहाँ अध्यक्ष का पदभार सँभाला । काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में आपका सहयोग रहा । हिन्दी भाषा तथा हिन्दी सेवाओं के लिए आपको रायबहादुर , साहित्य वाचस्पति , तथा डी – लिट की उपाधियों से विभूषित किया गया । सन् 1945 ई० में अगस्त मास में आपका देहावसान हुआ ।

बाबू श्यामसुन्दर दास की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

निबन्ध – हिन्दी का आदिकवि , नीति शिक्षा , चन्दबरदाई , भारतवर्ष की शिल्पशिक्षा , कर्त्तव्य और साधना आदि । इतिहास – हिन्दी साहित्य का इतिहास , कवियों की खोज आदि । अलोचना साहित्यालोचन , भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , रूपकरहस्य , गोस्वामी तुलसीदास आदि । पाठ्यपुस्तक संकलन – हिन्दी संग्रह , गद्य – कुसुमावली , भाषा – सार – संग्रह आदि । भाषा – विज्ञान – भाषा रहस्य , भाषा विज्ञान , हिन्दी भाषा का विकास आदि । जीवनी – मेरी आत्म – कहानी । सम्पादन – रामचरितमानस , कबीर – ग्रन्थावली , पृथ्वीराज रासो , संक्षिप्त पद्मावत , मेघदूत , नागरी प्रचारिणी पत्रिका आदि ।

भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है ? By आलोक वर्मा

भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है ?

। देश – प्रेम के भावों से परिपूर्ण इस निबन्ध को दिसम्बर सन् 1884 में बलिया के ददरी के अवसर पर आर्य देशोपकारणी सभा में भाषण देने के लिए लिखा गया था । इस निबन्ध के का लेखक ने भारतवर्ष की उन्नति के सन्दर्भ में कुछ सुझाव प्रस्तुत किये हैं । इसमें लेखक ने करीतिक और अंधविश्वासों को त्यागकर शिक्षित होने , उद्योग धन्धों को विकसित करने , सहयोग एवं एक पर बल देने तथा मानव को आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा दी है । भारतेन्द्र ने अपनी वरदर्शिता कारण देश की उन्नति के लिए ओजपूर्ण वाणी में संसारवासियों से आह्वान किया है ।

आज बड़े आनन्द का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बरे उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं । इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाय वही बहत है । । हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं । यद्यपि फर्स्ट क्लास सेकेण्ड क्लास आदि गाडी बढ़त अच्छी और बड़े – बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी है पर बिना इंजिन सब नहीं चल सकतीं , वैसे ही हिन्दुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते । इनसे इतना कह दीजिए ” का चुप साधि रहा बलवाना ” फिर देखिए हनुमान जी को अपना बल कैसा याद आता है । सो बल कौन याद दिलावै ? या हिन्दुस्तानी राजे – महाराजे , नवाब , रईस या हाकिम । राजे – महाराजों को अपनी पूजा , भोजन , झूठी गप से छुट्टी नहीं । हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है , कूछ बाल घुड़दौड़ थियेटर में समय गया । कुछ समय बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गन्दे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवें । बस वही मसल – ” तुम्हें गैरों से कब फुरसत हम अपने गम से कब खाली ? चलो बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली । ” पहले भी जब आर्य लोग हिन्दुस्तान में आकर बसे थे , राजा और ब्राह्मणों के जिम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलायें और अब भी ये लोग चाहें तो हिन्दुस्तान प्रतिदिन क्या प्रतिछिन बढ़े पर इन्हीं लोगों को निकम्मेपन ने घेर रखा है ।

हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जब कि इनके पुरुषों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठ करके बाँस की नलियों से जो ताराग्रह आदि बेध करके उनकी गति लिखी है वह ऐसी ठीक है कि सोलह । लाख रुपये के लागत की विलायत में जो दूरबीन बनी है उनसे उन ग्रहों को बेध करने में भी बनी । गति ठीक आती है और जब आज इस काल में हम लोगों को अँगरेजी विद्या के और जनता की । उन्नति से लाखों पुस्तकें और हजारों यंत्र तैयार हैं तब हम लोग निरी चंगी के कतवार फेंकने की । गाड़ी बन रहे हैं । यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है । अमेरिकन अँगरेज फरासीस आदि तुरकी ताजी सब सरपट दौड़े जाते हैं । सब के जी में यही है कि पाला हमी पहल छू ले । उस समय हिन्दू काठियावाड़ी खाली खड़े – खडे टाप से मिटटी खोजते हैं । इनको और का । जाने दीजिए जापानी टटुओं को हॉफते हए दौड़ते देख करके भी लाज नहीं आती । यह समय ऐसा कि जो पीछे रह जाएगा फिर कोटि उपाय किये भी आगे न बढ़ सकेगा । इस लूट में इस बरसात में श्री जिसके सिर पर कम्बख्ती का छाता और आँखों में मुर्खता की पट्टी बंधी रहे उस पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए ।

मझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर कुछ कहो कि हिन्दुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है ।

भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ ? भागवत में एक श्लोक है – ” नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभ लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं मयाऽनुकूलेन नमःस्वतेरितं पुमान् भवाब्धि न तरेत् स आत्महा । । भावान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जन्म ही बड़ा दुर्लभ है सो मिला और उस पर गुरु की कपा और उस पर मेरी अनुकूलता इतना सामान पाकर भी जो मनुष्य इस संसार सागर के पार न जाय उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए । वही दशा इस समय हिन्दुस्तान की है ।

बहुत लोग यह कहेंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती बाबा हम क्या उन्नति करें । तुम्हारा पेट भरा है तुमको दून की सूझती है । यह कहना उनकी बहत भूल है । इंग्लैण्ड का पेट भी कभी – यों ही खाली था । उसने एक हाथ से अपना पेट भरा दूसरे हाथ से उन्नति के कॉटों को साफ किया । क्या इंग्लैण्ड में किसान खेतवाले गाड़ीवान मजदूर कोचवान आदि नहीं हैं ? किसी देस में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते । किन्तु वे लोग जहाँ खेत जोते बोते हैं । वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी कौन नयी कल या मसाला बनावै जिसमें इस खेत में आगे से दून अन्न उपजै । विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं । जब मालिक उतर कर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला । यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पियेगा व गप्प करेगा । सो गप्प भी निकम्मी । ” वहाँ के लोग गप्प में ही देश के प्रबन्ध छाँटते हैं । सिद्धान्त यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धान्त है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाय । उसके बदले यहां के लोगों को जितना निकम्मापन हो उतना ही वह बड़ा अमीर समझा जाता है । आलस यहाँ इतनी बढ़ गई है कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला – ” अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम । दास मलूका कहि गये सबके दाता राम । ‘ चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करने बालों की ही चारों ओर बढ़ती है . रोजगार कहीं कुछ भी नहीं । चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हर हैं । किसी ने बहत ठीक कहा है कि दरिद्र कदम्बी इस तरह अपनी इज्जत को बचाता फिरता एजस लाजवंती बह फटे कपड़ों में अपने अंग को छिपाये जाती है । वही दशा हिन्दुस्तान की है । भद्रुमशुमारी की रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन – दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन – दिन कमती होता जाता है । सो अब बिना ऐसा उपाय किये काम नहीं चलेगा कि रुपया बढ़े । र वह रुपया बिना बुद्धि बढ़े न बढेगा । भाइयों राजा महाराजों का मुँह मत देखो मत यह आशा था कि पंडित जी कथा में ऐसा उपाय बतलाबैंगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े । तुम आप ही कमर कसो , आलस छोड़ो , कब तक अपने को जंगली , हस , मूर्ख , बोदे , डरपोकने पुकरवाओं दौडो , इस घड़दौड़ में जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं । ” फिर कब राम जनक पर अबकी पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहँचोगे ।

अब भी तुम लोग अपने को न सुधारो तो तुम्हीं रहो । और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो । धर्म में , घर में काम में , बाहर के काम में , रोजगार में , शिष्टाचार में चालचलन में , शरीर में , वल में , समाज में , युवा में , वृद्ध में , स्त्री में , पुरुष में , अमीर में , गरीब में , भारतवर्ष की सब अवस्था सब जाति , सब देस में उन्नति करो । सब ऐसी बातों को छोडोजी तुम्हारे इस पथ के कंटक हों । चाहे तुम्हें लोग निकम्मा कहें , या नंगा कहैं , कृस्तान कहें , या भात कहैं , तुम केवल अपने देश की दीन दशा को देखो और उनकी बात मत सुनो । “ अपमानं पुरस्का मानं कृत्वा तु पृष्टतः स्वकार्य साधयेत् धीमान् , कार्यध्वंसो हि मूर्खता । ” जो लोग अपने का देश हितैषी लगाते हों वह अपने सुख को होम करके अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कसके उठो । देखादेखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा । अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजा । कोई धर्म की आड़ में , कोई देस की चाल की आड़ में , कोई सुख की आड़ में छिपे हैं । उन चोरों को वहाँ – वहाँ से पकड़ कर लाओ । उनको बाँध – बाँध कर कैद करो । इस समय जो – जो बातें तुम्हारी उन्नति पथ की कॉटा हों उनकी जड़ खींचकर फेंक दो ।

अब यह प्रश्न होगा कि भाई हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है ? किसको अच्छा समझें ? क्या लें क्या छोड़ें ? तो कुछ बातें जो इस शीघ्रता से मेरे ध्यान में आती हैं उनको मैं कहता हूँ सुनो सब उन्नतियों का मूल धर्म है । इसके सबके पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है । देखो अंगरेजी की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली हैं । इससे उनकी दिन – दिन कैसी उन्नति है । उनको जाने दो , अपने ही यहाँ देखो । तुम्हारे यहाँ धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति समाज – गठन वैद्यक आदि भरे हुए हैं । दो एक मिसाल सुनो । यहीं तुम्हारा बलिया का मेला और यहाँ स्थान क्यों बनाया गया है । जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते दस – दस पाँच – पाँच कोस से वे लोग एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें । एक दूसरे का दुख – सुख जाने । गहस्थी के काम की वह चीज जो गाँव । में नहीं मिलती यहाँ से ले जाएँ । एकादशी का व्रत क्यों रखा है ? जिसमें महीने में दो एक उपवास । से शरीर शुद्ध हो जाय गंगा जी नहाने जाते हैं तो पहले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर डालने का विधान क्यों है ? जिसमें तलुए से गरमी सिर में चढ़कर विकार उत्पन्न करै । दीवाली इसी हेतु है कि । बसंत की बिगड़ी हवा स्थान – स्थान पर अग्नि बलने से स्वच्छ हो जाय । यही तिहवार ही तुम्हारा म्युनिसीपालिटी है । ऐसे सब पर्व सब तीर्थ व्रत आदि में कोई हिकमत हैं । उन लोगों ने धर्मनीति आर समाजनीति को दूध पानी की भांति मिला दिया है । खराबी जो बीच में भई है वह यंत्र है कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मान लिये थे इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक । धर्म मान लिया । भाइयों वास्तविक – धर्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है ।

ये सब जो समाज धर्म है । जो देश काल के अनसार शोधे और बदले जा सकते हो । यह हुई कि उन्हा महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों में अपने बाप दादों का मतलब का मतलब न समझकर बहुत से नये – नये धर्म बनाकर शाखों में धर दिये । बस सभी तिथि व्रत आर तीर्थ हो गये । सो इन बातों को अब एक बेर आँख खोलकर देख और समझ लीजिए बयान क्यों बनाई और उनमें जो देश और काल के अनुकूल और उपकारा हो उनका ग्रहण कीजिए । बहुत सी बातें जो समाज विरुद्ध मानी जाती हैं किन्तु धर्मशास्वा म जसा जहाज का सफर , विधवा विवाह आदि । लड़कों को छोटेपन में ही व्याह करके उनका बल , धीरज , आयुष्य सब मत घटाइए । आप उनके माँ बाप हैं या शत्रु है । व उनका शरार म पुष्ट हान दाजिए । नान तेल लकडी की फिक्र करने की बद्धि सीख लेने दाजिए । तब उनका पैर काठ में डालिए । कुलीन प्रथा बह विवाह आदि को दूर कीजिए । लड़कियों का भा पढ़ाइए किन्तु इस चाल से नहीं जैसे आजकल पढाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है । ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें पति की भक्ति कर और लड़कों को सहज में शिक्षा दें । नाना प्रकार के मत के लोग आपस में मिलिए , जाति में कोई चाहे ऊँचा हो चाहे नीचा हो सब का आदर कीजिए : जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए । छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोडिए । सब लोग आपस में मिलिए ।

अपने लड़कों को अच्छे से अच्छी तालीम दो । पिनशिन और वजीफा या नौकरी का भरोसा छोड़ो लड़कों को रोजगार सिखलाओ । विलायत भेजो । छोटेपन से मिहनत करने की आदत दिलाओ । बंगाली , मरट्ठा , पंजाबी , मदरासी , वैदिक , जैन , ब्राह्मणों , मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो । कारीगरी जिसमें तुम्हारे यहाँ बढे तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहैं वह करो । देखो जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली है वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंग्लैण्ड , फरासीस , जर्मनी , अमेरिका की जाती है । बीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है । जरा अपने ही को देखो । तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बनी है । जिस लंकलाट का तुम्हारा अंगा है । वह इंग्लैण्ड का है । फरासीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो । और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तम्हारे सामने बल रही है । यह तो वही मसल हुई एक बेफिकरे मँगनी का कपडा पहन कर किसी महफिल में गये । कपड़े को पहिचान कर एक ने कहा अजी अंगा तो फलाने का है दूसरा बोला । अजी टोपी भी फलाने की है तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि घर की तो मूंछे ही मूंछे हैं । हाय . अफसोस , तम ऐसे हो गये कि अपने निज की काम की वस्तु भी नहीं बना सकते । भाइयों अब तो नींद से चौंको अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो । जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढो वैसे ही खेल खेलो वैसी ही बातचीत करो । परदेशा वस्तु आर परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो । – भारतेन्दु हरिश्चन्द

By आलोक वर्मा

शिक्षण की प्रकृति तथा विशेषताएँ by आलोक वर्मा

शिक्षण की प्रकृति तथा विशेषताएँ

( Characteristics & Nature of Teaching )

उपर्युक्त परिभाषाओं की विवेचना के पश्चात् शिक्षण की निम्नांकित विशेषताएँ परिलक्षित की गयीं

1 . शिक्षण अधिगम की क्रिया को प्रभावशाली तथा व्यवस्थित बनाता है ।

2 . शिक्षण की समस्त प्रक्रियाओं का आधार मनोविज्ञान है ।

3 . शिक्षण के दो प्रमुख अंग हैं – ( 1 ) सीखने वाला तथा ( 2 ) सिखाने वाला ।

4 . शिक्षण और अधिगम की परिस्थितियों में सम्बन्ध स्थापित करता है ।

5 . शिक्षण का कार्य ज्ञान प्रदान करना है ।

6 . शिक्षण मार्गदर्शन करता है ।

7 . शिक्षण क्रियाशीलता बनाये रखता है ।

8 . शिक्षण का अर्थ अधिगम तथा शिक्षण की समस्त प्रक्रियाओं के संगठन से सम्बन्धित है ।

9 . शिक्षण छात्रों में उत्सुकता जाग्रत करता है ।

10 . शिक्षण कला एवं विज्ञान दोनों ही है । ‘

11 . शिक्षण एक कौशल युक्त क्रिया है ।

12 . शिक्षण में सांकेतिक , क्रियात्मक तथा शाब्दिक व्यवहार निहित रहते हैं ।

उपर्युक्त परिभाषाओं तथा विशेषताओं के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षण एक ऐसी । प्रक्रिया है जिसके माध्यम से छात्रों के व्यवहारों में वांछित परिवर्तन लाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की । क्रियाएँ सम्पादित की जाती हैं । इन क्रियाओं के फलस्वरूप शिक्षण और सिखाने वाली परिस्थितियों में । सम्बन्ध स्थापित हो जाता है ।

( by आलोक वर्मा )

शिक्षण की परिभाषाएँ by आलोक वर्मा

शिक्षण की परिभाषाएँ

( DEFINITIONS OF TEACHING )

शिक्षक के अर्थ को और अधिक स्पष्ट कर पका और अधिक स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित परिभाषाएं अधिक सहायता करेंगी

( a ) शिक्षण का शब्दकोषीय अर्थ ( Dictionary Meaning of Teaching )

1. Dictionary of Psychological and Psychoanalytical Terms -इस शब्दकोष के अनुसार इस शब्दकाम दूसरे को सीखने में मदद करने की प्रक्रिया को शिक्षण कहते हैं ।

” The art of assisting another to learn ( which includes ) . ( instruction ) and of appropriate situations , conditions ora another to leam ( which includes ) providing of information appropriate situations , conditions or activities designed to facintate learning . ”

2. World Boom Encyclopaedia – के अनसार – ” शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे का ज्ञान , कौशल तथा अभिरुचियों को सीखने या प्राप्त करने में सहायता करता है ।

The process by which one person helps others achieve knowledge , skills and ‘ aptitudes .

3. ” The Lettle Oxford Dictionary के अनुसार – ” ज्ञान प्रदान करना , कौशल का विकास करना , अनुदशन देना , पाठ पढाना तथा उन्हें उत्साहित करना शिक्षण का अर्थ है । ” ” Impart knowledge or skill , give instruction or lessons , instil and inspire with .

( b ) विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रदत्त परिभाषाएँ ( Definitions Given by Experts )

गेज ( Gage ) – “ शिक्षण एक प्रकार का पारस्परिक प्रभाव है जिसका उद्देश्य है दूसरे व्यक्ति के व्यवहारों में वांछित परिवर्तन लाना । ” _ ” Teaching is an act of interpersonal influence aimed at changing the ways in which other person can or will behave .

” रायन्स ( Ryans ) – ” दूसरों को सीखने के लिए दिशा निर्देश देने तथा अन्य प्रकार से उन्हें निर्देशित करने की प्रक्रिया को शिक्षण कहा जाता है । ” ” Teaching is concerned with the activities which are concerned with the guidance or direction of the learning of others .

” स्किनर ( Skinner ) – ” शिक्षण पुनर्बलन की Contingencies का क्रम है । ” ” Teaching is the arrangement of contingencies of reinforcement .

” स्मिथ ( Smith ) – ” शिक्षण का उद्देश्य निर्देशित क्रिया है । ” ” Teaching is a goal directed activity .

” जेम्स एम० थाइन ( James M . Thyne ) – ” समस्त शिक्षण का अर्थ है सीखने में वृद्धि करना । ‘ ” All teaching is the promotion of learning .

” क्लार्क ( Clarke . 1970 ) – ” शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसके प्रारूप तथा संचालन की व्यवस्था इसलिए की जाती है जिससे छात्रों के व्यवहारों में परिवर्तन लाया जा सके । ” ” Teaching process is designed and performed to produce change in student behaviour .

” बर्टन ( Burton ) ने शिक्षण को अधिगम हेतु उद्दीपन , मार्ग प्रदर्शन तथा दिशाबोध कहा है । बैन ( Banm ) इसे प्रशिक्षण कहता है । रायबर्न ( Rybum ) इसे एक ऐसा सम्बन्ध मानता है जो छात्रों को उनकी शक्तियों के विकास में सहायता देता है । के० पी० पाण्डेय के अनुसार

” Teaching is an influence – directed activity . . . . . . It is influencing the learner with a specific content structure . ”

एडमंड एमीडन ( Edmond Amidon ) – ” शिक्षण एक अन्तःप्रक्रिया है , जिसमें मुख्यतः कक्षा तक होती है , जो शिक्षक व छात्रों के मध्य कुछ परिभाषित की जा सकने वाली क्रियाओं के माध्यम से पनि होती है ।

” Teaching is an interactive process , primarily involving classroom talk which tato place between teacher and pupil and occurs during certain definable activities .

मौरीसन ( H . C . Morrison ) – ” शिक्षण एक परिपक्व व्यक्तित्व तथा कम परिपक्व के मध्य आप या घनिष्ट सम्बन्ध / सम्पर्क है जिसमें कम परिपक्व को शिक्षा की दिशा की ओर अग्रसित किया जाता ।

” Teaching is an intimate contact between a more mature personality and a less mature one which is designed to further the deduation of the later .

” विभिन्न प्रकार की अनेक परिभाषाओं का विश्लेषण करने के पश्चात् डॉ० शिव के० मित्रा इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं

” Teaching is a series of acts carried out by a teacher and guided by the formulation of teaching task in a formalised instructional situation . ”

डॉ० एस० पी० कुलश्रेष्ठ ( 1999 ) के शब्दों में कहा जा सकता है कि शिक्षण , प्रक्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे को ज्ञान प्रदान करने के लिये शिक्षण के कार्य को सम्पन्न करने के लिए अनेक प्रकार की क्रियायें करता है और छात्रों के व्यवहार में आत्मीयता के साथ वाँछित परिवर्तन लाने का प्रयास करता है ।
By। आलोक वर्मा

यू० पी० में शैक्षिक प्रसारण (by आलोक वर्मा )

यू० पी० में शैक्षिक प्रसारण

( 1 ) यू० पी० में प्राथमिक कक्षाओं के लिये DD – 1 पर शैक्षिक दूरदर्शन कार्यक्रम ‘ तरंग ‘ प्रा . 10 – 30 से 11 . 00 तक प्रसारित होता है ।

( 2 ) आकाशवाणी से रेडियो पर प्राथमिक कक्षाओं के लिये 12 . 10 से 12 . 30 तक शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है ।

( 3 ) स्कूल टेलीविजन के अन्तर्गत DD – 2 पर प्रातः 11 . 00 से 11 . 45 तक तथा 1 . 15 से 2 बजे तक कक्षा 6 से 10 तक के छात्रों के लिये दूरदर्शन कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं ।

शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में यू० पी० के जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान ( डायट ) भी महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं । कम लागत की शिक्षण सामग्री विकसित करना , डी० आर० यू० को अनौपचारिक शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा के लिये कम लागत की शिक्षण सामग्री विकसित करने में सहायता देना , संस्थान के सभी श्रव्य – दृश्य उपकरणों का रख – रखाव करना , कम्प्यूटर लैव संचालित करना , कम लागत की शिक्षण सामग्री का प्रदर्शन करना , पास के रेडियो स्टेशन से बच्चों , प्रौढ़ों तथा शिक्षकों के कार्यक्रम प्रसारण हेतु सम्पर्क करना तथा सेवारत शिक्षकों को शैक्षिक तकनीकी में आवश्यक प्रशिक्षण देना – इन संस्थानों के प्रमुख कार्य हैं ।

संशोधित शैक्षिक तकनीकी योजना के अन्तर्गत 1988 में केन्द्रीय सहायता से विद्यालयों को रेडियो कम – कैसेट प्लेयर ( 2 in 1 ) वितरित किये गये और उनके उपयोग को प्रभावशाली बनाने के लिये अनेक प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया गया । अब तक यू० पी० में 1800 प्राथमिक तथा उच्च विद्यालयों को रंगीन टी० वी० एवं 14412 उच्च प्राथमिक विद्यालयों को रेडियो – कम – कैसेट प्लेयर वितरित किये जा चुके हैं । इन उपकरणों का प्रयोग , औपचारिक , अनौपचारिक , प्रौढ़ शिक्षा तथा सामुदायिक उपयोग के लिये सफलतापूर्वक किया जा रहा है । इस प्रकार से उत्तर प्रदेश राज्य भी शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में सक्षम नेतृत्व देने की तैयारी में है ।

By आलोक वर्मा