भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है ?
। देश – प्रेम के भावों से परिपूर्ण इस निबन्ध को दिसम्बर सन् 1884 में बलिया के ददरी के अवसर पर आर्य देशोपकारणी सभा में भाषण देने के लिए लिखा गया था । इस निबन्ध के का लेखक ने भारतवर्ष की उन्नति के सन्दर्भ में कुछ सुझाव प्रस्तुत किये हैं । इसमें लेखक ने करीतिक और अंधविश्वासों को त्यागकर शिक्षित होने , उद्योग धन्धों को विकसित करने , सहयोग एवं एक पर बल देने तथा मानव को आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा दी है । भारतेन्द्र ने अपनी वरदर्शिता कारण देश की उन्नति के लिए ओजपूर्ण वाणी में संसारवासियों से आह्वान किया है ।
आज बड़े आनन्द का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बरे उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं । इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाय वही बहत है । । हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं । यद्यपि फर्स्ट क्लास सेकेण्ड क्लास आदि गाडी बढ़त अच्छी और बड़े – बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी है पर बिना इंजिन सब नहीं चल सकतीं , वैसे ही हिन्दुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते । इनसे इतना कह दीजिए ” का चुप साधि रहा बलवाना ” फिर देखिए हनुमान जी को अपना बल कैसा याद आता है । सो बल कौन याद दिलावै ? या हिन्दुस्तानी राजे – महाराजे , नवाब , रईस या हाकिम । राजे – महाराजों को अपनी पूजा , भोजन , झूठी गप से छुट्टी नहीं । हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है , कूछ बाल घुड़दौड़ थियेटर में समय गया । कुछ समय बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गन्दे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवें । बस वही मसल – ” तुम्हें गैरों से कब फुरसत हम अपने गम से कब खाली ? चलो बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली । ” पहले भी जब आर्य लोग हिन्दुस्तान में आकर बसे थे , राजा और ब्राह्मणों के जिम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलायें और अब भी ये लोग चाहें तो हिन्दुस्तान प्रतिदिन क्या प्रतिछिन बढ़े पर इन्हीं लोगों को निकम्मेपन ने घेर रखा है ।
हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जब कि इनके पुरुषों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठ करके बाँस की नलियों से जो ताराग्रह आदि बेध करके उनकी गति लिखी है वह ऐसी ठीक है कि सोलह । लाख रुपये के लागत की विलायत में जो दूरबीन बनी है उनसे उन ग्रहों को बेध करने में भी बनी । गति ठीक आती है और जब आज इस काल में हम लोगों को अँगरेजी विद्या के और जनता की । उन्नति से लाखों पुस्तकें और हजारों यंत्र तैयार हैं तब हम लोग निरी चंगी के कतवार फेंकने की । गाड़ी बन रहे हैं । यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है । अमेरिकन अँगरेज फरासीस आदि तुरकी ताजी सब सरपट दौड़े जाते हैं । सब के जी में यही है कि पाला हमी पहल छू ले । उस समय हिन्दू काठियावाड़ी खाली खड़े – खडे टाप से मिटटी खोजते हैं । इनको और का । जाने दीजिए जापानी टटुओं को हॉफते हए दौड़ते देख करके भी लाज नहीं आती । यह समय ऐसा कि जो पीछे रह जाएगा फिर कोटि उपाय किये भी आगे न बढ़ सकेगा । इस लूट में इस बरसात में श्री जिसके सिर पर कम्बख्ती का छाता और आँखों में मुर्खता की पट्टी बंधी रहे उस पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए ।
मझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर कुछ कहो कि हिन्दुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है ।
भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ ? भागवत में एक श्लोक है – ” नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभ लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं मयाऽनुकूलेन नमःस्वतेरितं पुमान् भवाब्धि न तरेत् स आत्महा । । भावान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जन्म ही बड़ा दुर्लभ है सो मिला और उस पर गुरु की कपा और उस पर मेरी अनुकूलता इतना सामान पाकर भी जो मनुष्य इस संसार सागर के पार न जाय उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए । वही दशा इस समय हिन्दुस्तान की है ।
बहुत लोग यह कहेंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती बाबा हम क्या उन्नति करें । तुम्हारा पेट भरा है तुमको दून की सूझती है । यह कहना उनकी बहत भूल है । इंग्लैण्ड का पेट भी कभी – यों ही खाली था । उसने एक हाथ से अपना पेट भरा दूसरे हाथ से उन्नति के कॉटों को साफ किया । क्या इंग्लैण्ड में किसान खेतवाले गाड़ीवान मजदूर कोचवान आदि नहीं हैं ? किसी देस में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते । किन्तु वे लोग जहाँ खेत जोते बोते हैं । वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी कौन नयी कल या मसाला बनावै जिसमें इस खेत में आगे से दून अन्न उपजै । विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं । जब मालिक उतर कर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला । यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पियेगा व गप्प करेगा । सो गप्प भी निकम्मी । ” वहाँ के लोग गप्प में ही देश के प्रबन्ध छाँटते हैं । सिद्धान्त यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धान्त है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाय । उसके बदले यहां के लोगों को जितना निकम्मापन हो उतना ही वह बड़ा अमीर समझा जाता है । आलस यहाँ इतनी बढ़ गई है कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला – ” अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम । दास मलूका कहि गये सबके दाता राम । ‘ चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करने बालों की ही चारों ओर बढ़ती है . रोजगार कहीं कुछ भी नहीं । चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हर हैं । किसी ने बहत ठीक कहा है कि दरिद्र कदम्बी इस तरह अपनी इज्जत को बचाता फिरता एजस लाजवंती बह फटे कपड़ों में अपने अंग को छिपाये जाती है । वही दशा हिन्दुस्तान की है । भद्रुमशुमारी की रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन – दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन – दिन कमती होता जाता है । सो अब बिना ऐसा उपाय किये काम नहीं चलेगा कि रुपया बढ़े । र वह रुपया बिना बुद्धि बढ़े न बढेगा । भाइयों राजा महाराजों का मुँह मत देखो मत यह आशा था कि पंडित जी कथा में ऐसा उपाय बतलाबैंगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े । तुम आप ही कमर कसो , आलस छोड़ो , कब तक अपने को जंगली , हस , मूर्ख , बोदे , डरपोकने पुकरवाओं दौडो , इस घड़दौड़ में जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं । ” फिर कब राम जनक पर अबकी पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहँचोगे ।
अब भी तुम लोग अपने को न सुधारो तो तुम्हीं रहो । और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो । धर्म में , घर में काम में , बाहर के काम में , रोजगार में , शिष्टाचार में चालचलन में , शरीर में , वल में , समाज में , युवा में , वृद्ध में , स्त्री में , पुरुष में , अमीर में , गरीब में , भारतवर्ष की सब अवस्था सब जाति , सब देस में उन्नति करो । सब ऐसी बातों को छोडोजी तुम्हारे इस पथ के कंटक हों । चाहे तुम्हें लोग निकम्मा कहें , या नंगा कहैं , कृस्तान कहें , या भात कहैं , तुम केवल अपने देश की दीन दशा को देखो और उनकी बात मत सुनो । “ अपमानं पुरस्का मानं कृत्वा तु पृष्टतः स्वकार्य साधयेत् धीमान् , कार्यध्वंसो हि मूर्खता । ” जो लोग अपने का देश हितैषी लगाते हों वह अपने सुख को होम करके अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कसके उठो । देखादेखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा । अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजा । कोई धर्म की आड़ में , कोई देस की चाल की आड़ में , कोई सुख की आड़ में छिपे हैं । उन चोरों को वहाँ – वहाँ से पकड़ कर लाओ । उनको बाँध – बाँध कर कैद करो । इस समय जो – जो बातें तुम्हारी उन्नति पथ की कॉटा हों उनकी जड़ खींचकर फेंक दो ।
अब यह प्रश्न होगा कि भाई हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है ? किसको अच्छा समझें ? क्या लें क्या छोड़ें ? तो कुछ बातें जो इस शीघ्रता से मेरे ध्यान में आती हैं उनको मैं कहता हूँ सुनो सब उन्नतियों का मूल धर्म है । इसके सबके पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है । देखो अंगरेजी की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली हैं । इससे उनकी दिन – दिन कैसी उन्नति है । उनको जाने दो , अपने ही यहाँ देखो । तुम्हारे यहाँ धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति समाज – गठन वैद्यक आदि भरे हुए हैं । दो एक मिसाल सुनो । यहीं तुम्हारा बलिया का मेला और यहाँ स्थान क्यों बनाया गया है । जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते दस – दस पाँच – पाँच कोस से वे लोग एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें । एक दूसरे का दुख – सुख जाने । गहस्थी के काम की वह चीज जो गाँव । में नहीं मिलती यहाँ से ले जाएँ । एकादशी का व्रत क्यों रखा है ? जिसमें महीने में दो एक उपवास । से शरीर शुद्ध हो जाय गंगा जी नहाने जाते हैं तो पहले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर डालने का विधान क्यों है ? जिसमें तलुए से गरमी सिर में चढ़कर विकार उत्पन्न करै । दीवाली इसी हेतु है कि । बसंत की बिगड़ी हवा स्थान – स्थान पर अग्नि बलने से स्वच्छ हो जाय । यही तिहवार ही तुम्हारा म्युनिसीपालिटी है । ऐसे सब पर्व सब तीर्थ व्रत आदि में कोई हिकमत हैं । उन लोगों ने धर्मनीति आर समाजनीति को दूध पानी की भांति मिला दिया है । खराबी जो बीच में भई है वह यंत्र है कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मान लिये थे इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक । धर्म मान लिया । भाइयों वास्तविक – धर्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है ।
ये सब जो समाज धर्म है । जो देश काल के अनसार शोधे और बदले जा सकते हो । यह हुई कि उन्हा महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों में अपने बाप दादों का मतलब का मतलब न समझकर बहुत से नये – नये धर्म बनाकर शाखों में धर दिये । बस सभी तिथि व्रत आर तीर्थ हो गये । सो इन बातों को अब एक बेर आँख खोलकर देख और समझ लीजिए बयान क्यों बनाई और उनमें जो देश और काल के अनुकूल और उपकारा हो उनका ग्रहण कीजिए । बहुत सी बातें जो समाज विरुद्ध मानी जाती हैं किन्तु धर्मशास्वा म जसा जहाज का सफर , विधवा विवाह आदि । लड़कों को छोटेपन में ही व्याह करके उनका बल , धीरज , आयुष्य सब मत घटाइए । आप उनके माँ बाप हैं या शत्रु है । व उनका शरार म पुष्ट हान दाजिए । नान तेल लकडी की फिक्र करने की बद्धि सीख लेने दाजिए । तब उनका पैर काठ में डालिए । कुलीन प्रथा बह विवाह आदि को दूर कीजिए । लड़कियों का भा पढ़ाइए किन्तु इस चाल से नहीं जैसे आजकल पढाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है । ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें पति की भक्ति कर और लड़कों को सहज में शिक्षा दें । नाना प्रकार के मत के लोग आपस में मिलिए , जाति में कोई चाहे ऊँचा हो चाहे नीचा हो सब का आदर कीजिए : जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए । छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोडिए । सब लोग आपस में मिलिए ।
अपने लड़कों को अच्छे से अच्छी तालीम दो । पिनशिन और वजीफा या नौकरी का भरोसा छोड़ो लड़कों को रोजगार सिखलाओ । विलायत भेजो । छोटेपन से मिहनत करने की आदत दिलाओ । बंगाली , मरट्ठा , पंजाबी , मदरासी , वैदिक , जैन , ब्राह्मणों , मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो । कारीगरी जिसमें तुम्हारे यहाँ बढे तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहैं वह करो । देखो जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली है वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंग्लैण्ड , फरासीस , जर्मनी , अमेरिका की जाती है । बीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है । जरा अपने ही को देखो । तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बनी है । जिस लंकलाट का तुम्हारा अंगा है । वह इंग्लैण्ड का है । फरासीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो । और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तम्हारे सामने बल रही है । यह तो वही मसल हुई एक बेफिकरे मँगनी का कपडा पहन कर किसी महफिल में गये । कपड़े को पहिचान कर एक ने कहा अजी अंगा तो फलाने का है दूसरा बोला । अजी टोपी भी फलाने की है तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि घर की तो मूंछे ही मूंछे हैं । हाय . अफसोस , तम ऐसे हो गये कि अपने निज की काम की वस्तु भी नहीं बना सकते । भाइयों अब तो नींद से चौंको अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो । जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढो वैसे ही खेल खेलो वैसी ही बातचीत करो । परदेशा वस्तु आर परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो । – भारतेन्दु हरिश्चन्द
By आलोक वर्मा