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आवास (जीव जन्तुओ के आवास) UPTET by आलोक वर्मा

जीव जन्तुओं के आवास

( Habitat of Living organisms )

जीव – जन्तु जिस वातावरण में रहकर अपनी प्रजाति की वृद्धि करते हैं , वही उनका आवास कहलाता है । इस आवास में वे जीव – जन्तु रहते हैं , भोजन प्राप्त करते हैं एवं अपनी संतानोत्पत्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियों प्राप्त । करते हैं ।

आवास के प्रकार ( Types of Habitat )

  • स्थलीय आवास – स्थल पर रहने वाले सभी जीवों का आवास । स्थलीय आवास ( Terrestrial habitat ) कहलाता है । इसमें निम्न प्रकार के आवास शामिल किये जाते हैं – 1 . वनीय आवास 2 . घास भूमियों 3 . मरुस्थलीय आवास 4 . पहाड़ी आवास 5 . ध्रुवीय आवास
  • वनीय आवास में जन्तु एवं पेड़ – पौधे दोनों पाये जाते हैं जो एक – दूसरे पर आश्रित होते हैं । सभी प्रकार के जंगली जानवर एवं वनस्पति इस प्रकार के आवास में रहते हैं । ।
  • घास भूमि आवास – पास भूमियों में लम्बी व मोटी घास अत्यधिक मात्रा में उगती है । यहाँ के मुख्य जानवरों में जेबरा जिराफ , हाथी . गजेला , राइनोसोर , हिरण आदि होते हैं । प्रमुख घास भूमियों के उदाहरण हैं – सवाना प्रेयरीज डाउन्स स्टेपी , मीडोज लानोस पपाज , ग्रान चाको आदि ।
  • मरुस्थलीय आवास – मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा अत्यधिक कम व तापमान की अतिशयताएँ होती हैं । यहाँ पाये जाने वाले जन्तुओं में ऊँट , केटल सॉप , कंगारू , चूहे आदि तथा वनस्पति में काँटेदार व मोटी व मांसल पत्ती वाले पेड़ – पौधे मिलते हैं ।
  • पहाड़ी आवासों में याक , भालू , पहाड़ी बकरियाँ उड़ने वाली लोमड़ी । आदि मिलते हैं ।
  • धुवीय आवास – धुवीय क्षेत्रों में वर्ष भर अत्यधिक बर्फ जमी रहती है । अतः यहाँ पाये जाने वाले जन्तुओं के शरीर पर फर होते है तथा चर्म के अन्दर वसा की परत होती है , जो न केवल सर्दी से सुरक्षा करती है बल्कि अत्यधिक ठण्ड के दिनों में उनके लिए संरक्षित भोजन का कार्य भी करती है । यहाँ ध्रुवीय भालू , रेडियर , आर्कटिक लोमड़ी , सील , स्नोगूज , आर्कटिक भेड़िया , खरगोश , बाल्ड ईगल , बेलुगाव्हेल , उलशीप ( भेड़ ) , एमीन , वालरस , वोल्वरिन आदि जानवर मिलते हैं ।
  • जलीय आवास – जलीय आवास निम्न प्रकार के होते हैं
  • ताजा जलीय आवास – नदियाँ , झीलें , तालाब , झरने आदि । इनमें मछलियाँ , केकड़े , मगरमच्छ , टैडपोल , मेढक कैटफिश , सर्प , ड्रेगन फ्लाई आदि जन्तु पाये जाते हैं ।
  • समुद्री आवास – समुद्री पानी में मछली , व्हेल , डॉग फिश , स्टार फिश , जेली फिश , ऑक्टोपस , शार्क मछली , व्हेल मछली , समुद्री घोड़ा ( एक प्रकार की मछली ) , समुद्री ड्रेगन , समुद्री कछुआ , मगरमच्छ , समुद्री सॉप आदि जीव – जन्तु मिलते हैं ।
  • तटवर्ती आवास – इन क्षेत्रों में समुद्री जल एवं नदियाँ द्वारा लाये गये ताजा जल का मिश्रण मिलता है । अतः यहाँ मैलोव प्रकार की वनस्पति की बहुलता रहती है । ।

कुछ जीव – जन्तुओं के विशिष्ट आवास

( Specific Habitats of certain Living Organisms )

  • बिल – कुछ जन्तु धरती में बिल बनाकर रहते हैं , जैसे – चूहा , साँप । खरगोश , दीमक , चींटी , गोयरा आदि ।
  • घोंसला – कुछ पक्षी पेड़ों पर या घरों में घोंसला बनाकर रहते हैं , जैसे बया , बुलबुल , कठफोड़वा , चिड़िया , कबूतर आदि । बया का घोंसला बहत सुन्दर होता है ।
  • गिलहरी – पेड़ की कोटर में रहती है ।
  • मांद या गुफा – शेर ‘ , भेड़िये , लोमड़ी , भालू आदि माद या गुफा में रहते है ।
  • केनल – कुत्तों का आवास ।
  • पेड की शाखाएँ – बंदर चील , कौआ , टिड्डा आदि पेड़ की शाखाओं पर रहते हैं ।
  • छत्ता – मधुमक्खी , बर्र , ततैया आदि छत्ते में रहते हैं ।
  • घर – छिपकली , चूहे व पालतू जन्तु घरों में रहते है ।
  • जल – जल समुद्रों , नदियों आदि में रहने वाले जीव – जन्तुओं का आवास होता है ।
  • गाय , भैंस , भेड़ – बकरी आदि पालतू जानवरों के लिए छप्पर या बाडा बनाया जाता है । पक्षियों के लिए पिंजरा या जाली का घर बनाना पड़ता है ।
  • सूअर – शूकर शाला ( sty )
  • घोड़ा – अस्तबल ( Stable )
  • कंगारू – पेड़ की कोटर
  • मकड़ी – जाल ( Web )
  • मुर्गी – मुर्गी खाना या दबड़ा ।

मानव आवास

( Human Habitat )

प्रत्येक मानव के लिए घर एक मूलभूत आवश्यकता है । मकान गर्मी : सर्दी वर्षा व जीव – जन्तुओं से हमें सुरक्षित रखता है । मकान में हमारे समस्त कार्य सम्पादित होते हैं । कच्चे घर , पक्के घर झोपड़ियाँ आदि विभिन्न प्रकार के मानवीय आवास हैं । आवास से तात्पर्य वह स्थान है , जो ईंट , पत्थर , संगमरमर आदि से बना हो । इसमें एकाकी झोंपड़ी से लेकर नवीनतम भवन , राजप्रसाद , दुर्ग आदि सभी शामिल हैं । आवास की आवश्यकता निम्न कारणा

  • दिनभर के श्रम के बाद रात्रि में सुरक्षित स्थान पर शयन व विश्राम हेतु।
  • जंगली पशुओं , चोर – डाकुओं एवं शत्रुओं से सुरक्षा हेतु ।
  • आर्थिक क्रियाओं द्वारा उत्पादित वस्तुओं के संग्रहण व अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा हेतु ।
  • मानव की समस्त गतिविधियों के संचालन हेतु ।

विभिन्न प्रकार के विशिष्ट मानव आवास

  • इग्लू – ये उत्तरी अमेरिका की ग्रीनलैण्ड के आर्कटिक क्षेत्र के टण्डा प्रदेश में निवास करने वाली एस्किमो जन जातियों के आवास है । एस्किमो लोग हही खाल तथा बर्फ के सख्त टुकड़ों को जोड़कर ‘ इरल ( Igloo ) नामक गुम्बदनुमा मकान बनाते है । शीतकाल की कड़ाकेदार ठण्ड इन मकानों की मजबूती बढ़ाती है । इन मकानों का व्यास 4 – 5 मीटर तथा ऊंचाई 3 मीटर तक होती है । इग्लू ‘ के अन्दर की तरफ दीवारों तथा फ्लोर पर सील मछली की खाल लगायी जाती है । इससे ये मकान अन्दर से गर्म बने रहते हैं । दीवार । व खाल के मध्य रिक्त स्थान छोड़ा जाता है । इस रिक्त स्थान में । तण्डी हवा की उपस्थिति होती है । इससे इग्ल की आन्तरिक गर्मी से बर्फ से बनी दीवारें पिघलती नहीं हैं । इग्लू ‘ में गर्मी व रोशनी बनाये रखने के लिए सील मछली की चर्बी जलायी जाती है । ‘ इग्लू ‘ में एक छोटा द्वार होता है । इस द्वार का प्रयोग लेट कर । अन्दर – बाहर आने – जाने में किया जाता है । एस्किमो कुछ घण्टों में ही अच्छा ‘ इग्लू ‘ बना लेते हैं । परिवार बड़ा होने पर एक से अधिक ‘ ग्लू ‘ आपस में जोड़कर बनाये जाते हैं ।
  • ट्यूपिक – एस्किमो लोगों के चमड़े के बने तम्बू जो उनके ग्रीष्मकालीन आवास होते हैं । ये घर केरीबो तथा धुवीय भालू की खाल के बने । होते हैं ।
  • किस्ताऊ – कजाकिस्तान की खिरगीज जाति के आवास स्थान जो घास से निर्मित होते हैं । खिरगीज इनमें शीत ऋतु में निवास करते
  • युत – खिरगीज जाति के ग्रीष्मकालीन आवास । ये चमड़े के बने तम्बू होते हैं । ये ऊनी नमदे से भी बनाए जाते हैं ।
  • कू – भील जनजाति के आवास जो आयताकार होते हैं । इनकी दीवारें बॉस या पत्थर की बनी होती हैं , फर्श मिट्टी या पत्थर का तथा छत खपरैल या घास – फूस की ।
  • बंगाल ओराक व कातोम ओराक – संथाल जनजाति के आवास गृह ।
  • क्राल – दक्षिण अफ्रीका में बण्टू और नाटाल में जुलू जनजाति के तथा पूर्वी अफ्रीका में मसाई जनजाति के लोगों द्वारा बनाई गई घास की झोपड़ियाँ ।
  • तिपि – रॉकी पर्वत के पूर्वी भागों में रेड इंडियन लोगों द्वारा बिसन बैल के चमड़े से व लम्बे बाँसों से बनाए गए शंक्वाकार तम्बू । ये पोर्टेबल होते हैं ।
  • विगवाम – अमेरिकी आदिवासियों के आवास । ये छोटे व सामान्यतः गोल आकार में बने होते हैं । इन्हें ‘ वेतु ‘ भी कहा जाता है ।
  • लोंगहाउस – ये अमेरिका की इरोक्युअस जाति के आवास होते हैं । ये बहुत बड़े होते हैं ।
  • अर्स – भारत में नीलगिरि की पहाड़ियों में निवास करने वाली आदिम जाति के लम्बे बड़े ढोल की आकति के घर ।
  • बशमैन जाति के आवास – अफ्रीका महाद्वीप के कालाहारी मरुस्थल की आखेटक जनजाति बुशमैन ( सान ) के लोग स्थायी व पक्के मकान नहीं बनाते हैं । ये लोग मौसम की कठोरता व जगली । जानवरों से बचाव के लिए झोपड़ियों , गुफाओं या टेंटों में रहते हैं । झोपड़ियों के निर्माण में लकड़ी , घास , पत्तियों व खालों का प्रयोग किया जाता है ।
  • खाइमास – अरब व सहारा के बद्दू जाति के लोगों के तम्बू है।
  • पिग्मी जाति के आवास – पिग्मी शिकार पर निर्भर रहते है अश स्थायी रूप से घर बगाकर नहीं रहते हैं । पिग्मी जंगली जीवा स सुरक्षा की दृष्टि से अपनी झोपडिगा वक्षों पर जाना है । इनका झोपड़ियों सधुमक्खी के छत्ती की भाति गोल बनाई जाती है ।
  • झोपे – शुष्क व पश्चिमी राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों में बन घर
  • पड़वा – राजस्थान में मरुस्थल में बनाए जाने वाले घर । पड़वा की । डुवारे प्रायः धूप में सखाई मिटी की इंटी से बनाते हैं और कलू खपरेल ) से तलवाँ छत बनाते हैं ।
  • टपरा व डागला – राजस्थान के आदिवासियों का सामान्य घर ।
  • भाखर का ढाँचा – राजस्थान के गिरासिया जनजातियों का घर ।
  • मुनसा – उत्तराखंड के भोटिया जनजाति का शीतकालीन आवास
  • मैत – उत्तराखंड के भोठिया जनजाति का ग्रीष्मकालीन आवास ।
  • ऑल – यूरोप के कॉकेशस पर्वतीय क्षेत्र की कबीलाई जनजातियों द्वारा लकड़ी के ऊपर चमड़ा मदकर बनाया गया वृत्ताकार व तम्बूनुमा आवास ।
  • इज्वा – उत्तरी रूस के ग्रामीण जनजातियो द्वारा बनाया गया त्रिकोणीय । रंगीन आवास ।
  • प्लक गृह – अमेरिका के उत्तरी पश्चिमी तट पर रहने वाली आदिवासी जातियों के घर । ये घर केदार Cedar ) लकड़ी के बनाए जाते है ।
  • प्यूब्लोस – दक्षिण – पश्चिम अमेरिका में प्युब्लोस इंडियन द्वारा बनाए जाने वाले घर ।
  • चिकोज – अमेरिका में फ्लोरिडा में सेमीनोल इडियन्स ( Seminoles Indian ) द्वारा बनाए जाने वाले घर । इन घरों में दीवारे नहीं होती है , केवल छप्पर की छत और एक लकड़ी का प्लेटफार्म होता है जो भूमि से कई फीट ऊँचा होता है । ये घर गर्म व दलदली ( Swampy ) जलवायु के लिए उपयुक्त होते हैं ।
  • होगान – ये घर दक्षिण – पश्चिम अमेरिका की आदिवासी जाति Navaja द्वारा बनाये जाते हैं । इसमें कोई खिड़की नहीं होती है , बल्कि धुआँ निकलने के लिए छत में एक छेद होता है । इन घरों का प्रवेश द्वार हमेशा पूर्व की तरफ होता है ।
  • विकीअप्स ये अमेरिका की अपाचे ( Apache ) जाति के लोगों द्वारा बनाए जाने वाले घर हैं । ये उल्टे ॥ आकार ( Upside – down U shaped ) के घर होते हैं जो वृक्षों से बनाए जाते हैं तथा इन्हें जानवरों की खाल से ढका जाता है । घर का प्रवेश द्वार बहुत छोटा Mur होता है ।

आवास और निकटवर्ती स्थानों की स्वच्छता

( Cleaning of the Habitat & Surrounding )

स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छता आवश्यक है । घर वह स्थान होता है । जहाँ परिवार निवास करता है । परिवार के सभी सदस्यों को प्रसन्नचित्त व स्वस्थ रखने के लिए हमें अपने आवास और आस – पास के स्थान को स्वच्छ रखना चाहिए । इसके लिए निम्न बातो का ध्यान रखना आवश्यक है .

  • मकान की नालियों साफ – सुथरी व ढकी हुई हो ।
  • शौचालय व स्नानागार प्रतिदिन अच्छी तरह से साफ किए जाने चाहिए क्योंकि यहाँ कीटाणु पनपने की संभावना सर्वाधिक होती है । पर की नालियों में कीटनाशको का नियमित छिड़काव किया जाना चाहिए ।
  • कमरों में से दूषित हवा निकलने के लिए रोशनदान की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए ।
  • समस्त कूड़ा – करकट प्रतिदिन एक कूड़ेदान में एकत्रित करना चाहिए । यह कूड़ादान ढक्कन वाला होना चाहिए ।
  • रसोईघर में धुएँ के निकास के लिए चिमनी की व्यवस्था होनी चाहिए ।
  • घर में प्रतिदिन फिनायल आदि डालकर पोंछा लगाया जाना चाहिए ताकि मच्छर व मक्खी न फैल सकें ।
  • घर का समस्त कूड़ा – करकट बाहर नहीं फेंकना चाहिए । इसे नगर परिषद् के सफाई कर्मचारी के सुपुर्द किया जाना चाहिए ।
  • गली – मोहल्ले की नालियाँ भी साफ करवानी चाहिए ।
  • नगर परिषद् से संपर्क कर समय – समय पर कीटनाशकों , फिनायल , बीएचसी पाउडर आदि का छिड़काव करवाना चाहिए ।
  • सामुदायिक स्वास्थ्य के लिए आवासीय बस्तियाँ योजानाबद्ध रूप से बसी होनी चाहिए , जिसमें सभी आवासों के लिए समुचित हवा , पानी , रोशनी , जल निकास व शौचालय आदि की व्यवस्था हो ।
  • गंदे जल के निकास की नालियाँ व गटर ढंके हुए हों ।
  • आवासीय बस्तियों में जल के गड्ढे नहीं होने चाहिए , क्योंकि इन स्थानों पर मच्छर पनपने की सम्भावना रहती है ।
  • जल स्रोत साफ – स्वच्छ होने चाहिए । कुएँ ढंके हों , जिनमें समय – समय पर जीवाणुनाशक दवाएँ डाली जाती रहें ।
  • हण्डपम्प , कएँ व बावड़ियाँ आदि के आस – पास का स्थान स्वच्छ रखना चाहिए । इन स्रोतों में कपड़े व बर्तन धोना , स्वयं नहाना , जानवरों को नहलाना आदि कार्य नहीं करने चाहिए ।
  • पानी की टंकियों की नियमित सफाई की जानी चाहिए ।
  • बस्ती में वृक्षारोपण करना चाहिए ।
  • मरे हुए जानवरों को जलस्रोत या बस्तियों से दूर उचित स्थान पर डालना चाहिए ।
  • हर घर के बाहर या कुछ घरों के बीच कचरा पात्र रखे जायें । ।
  • समुदाय के लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए ।
  • लोगों को गंदगी से होने वाली बीमारियों व संक्रामक रोगों के बारे में जानकारी होनी चाहिए ताकि वे अपने आस – पास के क्षेत्र को साफ – सुथरा रख सकें ।
  • भारत सरकार ने 15 अगस्त , 2014 को स्वच्छ भारत मिशन कार्यक्रम शुरू किया है , जिसके तहत 2 अक्टूबर , 2019 तक यह कार्यक्रम चलेगा ।

By आलोक वर्मा

उत्तर प्रदेश के संस्थान For UPTET By आलोक वर्मा

जिला का नाम व संस्थान का नाम

1. गाज़ियाबाद

1. राष्ट्रीय जैव उर्वरक विकास केंद्र,

2. कपड़ा अनुसंधान संस्थान

2. सहारनपुर

सेंट्रल पल्प एंड पेपर रिसर्च इंस्टीट्यूट

3. लखनऊ

1. उत्तर प्रदेश कृषि अनुसन्धान संस्थान

2. केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान

3. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान

4. भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान

5. बीरबल साहनी पुरावनस्पति शास्त्र अनुसंधान संस्थान

6. राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान

7. नेशनल ब्यूरो ऑफ़ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज

4. कानपुर

1. J. K. कैंसर संस्थान

2. केंद्रीय वस्त्र संस्थान

3. भारतीय चमड़ा रंगाई एवं जुटा संस्थान

4. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान

5. राष्ट्रीय चीनी अनुसंधान संस्थान

5. ग्रेटर नॉएडा

1. वी. वी. गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान,

2. राष्ट्रीय उद्यमिता एवं लघु व्यवसाय विकास संस्थान

6. मथुरा

केन्द्रीय बकरी अनुसन्धान संस्थान

7. बुलंदशहर

केन्द्रीय कांच एवं सिरामिक अनुसन्धान व प्रसार केंद्र

8. ग्रेटर नॉएडा

राष्ट्रीय सांख्यिकीय प्रशासन अकादमी

9. मेरठ

केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र

10. बरेली

1. केन्द्रीय पक्षी अनुसन्धान संस्थान (इज्ज़त नगर)

2. भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान (इज्ज़त नगर)

11. झाँसी

भारतीय चारागाह एवं अनुसन्धान संस्थान

12. महोबा

पान अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण केंद्र

13. इलाहाबाद

1. हरिश्चंद्र अनुसन्धान संस्थान,

2. केन्द्रीय अन्तर्स्थलीय मत्स्यिकी अनुसन्धान संस्थान

14. वाराणसी

1. भारतीय हथकरघा तकनीकी संस्थान

2. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हैंडलूम टेक्नोलॉजी

3. भारतीय सब्जी अनुसन्धान संस्थान

15. संत रविदास नगर

भारतीय कालीन प्रद्योगिकी संस्थान

16. रायबरेली

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी

17.आगरा

केंद्रीय कुष्ठ रोग संस्थान

By आलोक वर्मा

राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र

राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र – 14

1.भाकृअनुप- राष्ट्रीय केला अनुसंधान केन्द्र, त्रिची
2.भाकृअनुप- राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केन्द्र, पुणे
3.भाकृअनुप- राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर
4.भाकृअनुप- राष्ट्रीय अनार अनुसंधान केन्द्र, शोलापुर
5.भाकृअनुप- राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर
6.भाकृअनुप- राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र, हिसार
7.भाकृअनुप- राष्ट्रीय मांस अनुसंधान केन्द्र, हैदराबाद
8..भाकृअनुप- राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केन्द्र, मेदजीफेमा, नगालैंड
9.भाकृअनुप- राष्ट्रीय आर्किड अनुसंधान केन्द्र, पेकयांग, सिक्किम
10.भाकृअनुप- राष्ट्रीय शूकर अनुसंधान केन्द्र, गुवाहाटी
11.भाकृअनुप- राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र, नई दिल्ली
12.भाकृअनुप- राष्ट्रीय बीज मसाला अनुसंधान केन्द्र, अजमेर
13.भाकृअनुप- राष्ट्रीय याक अनुसंधान केन्द्र, वेस्ट केमंग
14.भाकृअनुप- राष्ट्रीय समन्वित नाशीजीव प्रबंधन केन्द्र, नई दिल्ली

By Alok Verma

प्राकृतिक संकट तथा आपदायें

प्राकृतिक संकट तथा आपदायें

आपदा प्रायः एक अनपेक्षित घटना होती है , जो ऐसी शक्तियों द्वारा घटित होती है , जो मानव के नियन्त्रण में नहीं हैं । यह थोड़े समय में और बिना चेतावनी के घटित होती है । इसके कारण मानव जीवन के क्रियाकलाप अवरुद्ध हो जाते हैं तथा बड़े पैमाने पर जानमाल का नुकसान होता है । अतः इससे सुरक्षा के लिए मानव को सामान्यतः प्राप्त होने वाली वैधानिक आपातकालीन सेवाओं की अपेक्षा अधिक प्रयत्न करने पड़ते हैं ।
आपदा का सामान्य अर्थ विपदा या संकट से होता है । इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है
( i ) प्राकृतिक आपदा ( भूकम्प , ज्वालामुखी , बाढ़ व सूखा ) व
( ii ) मानवीय आपदा ( मानवजनित भूस्खलन , रसायनों का प्रयोग ) में बाँटा जा सकता है
प्राकृतिक आपदाओं का वर्गीकरण
प्राकृतिक आपदाओं को मुख्य रूप से चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता हैं
( क ) वायुमण्डलीय : • बर्फानी तूफान • तड़ितझंझा • तड़ित • टॉरनेडो • सूखा • पाला , लू , शीतलहर
( ख ) भौमिक : • भूकम्प • ज्वा ामुखी • भूस्खलन • हिमघाव • अवतलन • मृदा अपरदन
( ग ) जलीय : • बाढ़ • ज्वार • महासागरीय धाराएँ • तूफान महोर्मि • सुनामी .
भारत में प्राकृतिक आपदाएँ
भारत में प्रमुख रूप से निम्नलिखित प्राकृतिक आपदाएँ देखने को मिलती हैं

( क ) भूकम्प

भूकम्प सबसे ज्यादा अपूर्वसूचनीय और विध्वंसक प्राकृतिक आपदा है । जब आन्तरिक शक्तियों के द्वारा धरातल का कोई भाग हिलता है तो उसे भूकम्प कहते हैं । भूकम्प से सामान्य तात्पर्य भूपटल के कम्पन्न से है । इस उत्पन्न करने में मानवीय प्रक्रियाओं का भी योगदान होता है ।
भूकम्प के कारण –

• विवर्तनिकता

ज्वालामुखी क्रिया
समस्थितिक समायोजन
भूपटल का संकुचन
जलीय भार ।
भारत में 26 जनवरी , 2011 को कच्छ ( गुजरात ) में आया भूकम्प सबसे खतरनाक था जिसमें लगभग 80 हजार से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई । इसी प्रकार 1967 व 1993 में महाराष्ट्र में आए भूकम्प ने प्रायद्वीप तके भूकम्प रहित होने की अवधारणा को बदल दिया ।
राष्ट्रीय भूभौतिकी प्रयोगशाला , भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण , मौसम विज्ञान विभाग और इनके साथ कुछ समय पूर्व बने राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान ने भारत में आए 1200 भूकम्पों का गहन विश्लेषण किया और भारत को पाँच ( 5 ) भूकम्पीय क्षेत्रों ( Zones ) में बाँटा है
( 1 ) अत्यधिक क्षति जोखिम क्षेत्र
( 2 ) अधिक क्षति जोखिम क्षेत्र
( 3 ) मध्यम क्षति जोखिम क्षेत्र
( 4 ) निम्न क्षति जोखिम क्षेत्र
( 5 ) अति निम्न क्षति जोखिम क्षेत्र ।

( ख ) सुनामी

भूकम्प और ज्वालामुखी से महासागरीय धरातल में अचानक हलचल उत्पन्न होती है और महासागरीय जल का विस्थापन होता है । परिणामस्वरूप लम्बवत् ऊँची तरंगें पैदा होती हैं जिन्हें सुनामी ( बन्दरगाह लहरें ) कहा जाता है । सुनामी का प्रमुख कारण समुद्र तली में भूकम्प का आना होता है । 26 दिसम्बर , 2004 को हिन्द महासागर में आई सुनामी अब तक की सबसे बड़ी व खतरनाक सुनामी थी जिसमें 3 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई थी ।

( ग ) उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात कम दबाव वाले उग्र मौसम तन्त्र हैं और 30° उत्तर तथा 30° दक्षिण अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं । यह साधारणतया 500 से 1000 किमी क्षेत्र में फैला होता है और इसकी लम्बवत् ऊँचाई 12 से 14 किमी हो सकती है । इसमें पवनें परिधि से केन्द्र की ओर चलती हैं । भारत में सर्वाधिक चक्रवात बंगाल की खाड़ी में अक्टूबर और नवम्बर के मध्य उत्पन्न होते हैं ।

( घ ) बाढ़

वर्षा ऋत में जब नदी में जल की मात्रा अपनी सामर्थ्य से अधिक हो जाती है तब जल नदी के दोनों पाश्वों पर से निकलकर दूर – दूर क्षेत्र में फैल जाता है और क्षेत्र को जलमग्न कर देता है जिसे बाढ़ कहते हैं । बाढ़ का सबसे प्रमुख कारण अत्यधिक वर्षा को माना जाता है । इसके अतिरिक्त अन्य ( बाँधों का टूटना , लहरें आना ) कारण भी इसके लिए उत्तरदायी होते हैं । भारत में 4 करोड़ हैक्टेयर भूमि को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र घोषित किया गया है । देश में असम , पश्चिम बंगाल , बिहार , पूर्वी उत्तर प्रदेश , ओडिशा , तमिलनाडु , आन्ध्र प्रदेश , उत्तर गुजरात आदि प्रमुख बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं ।

( ङ ) सूखा

सूखा ऐसी स्थिति को कहा जाता है जब लम्बे समय तक कम वर्षा , अत्यधिक वाष्पीकरण और जलाशयों तथा भूमिगत जल के अत्यधिक प्रयोग से भूतल पर जल की कमी हो जाए ।

सूखे के प्रकार –

सूखा निम्नलिखित प्रकार का होता है
1 . मौसम विज्ञान सम्बन्धी सूखा
2 . कृषि सूखा
3 . जलविज्ञान सम्बन्धी सूखा
4 . पारिस्थितिक सूखा
भारत में सूखा – ग्रस्त क्षेत्र को मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में बाँटा गया है
( i ) अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र ( राजस्थान के जैसलमेर व बाड़मेर जिले )
( ii ) अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र ( राजस्थान का पूर्वी भाग , महाराष्ट्र के पूर्वी भाग )
( iii ) मध्यम सूखा प्रभावित क्षेत्र ( हरियाणा , उत्तर प्रदेश के दक्षिणी भाग , आन्तरिक कर्नाटक )
महत्त्वपूर्ण शब्दावली
1 . आपदा – प्राकृतिक व मानवीय क्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न संकट ।
2 . भूकम्प – आन्तरिक शक्ति के द्वारा भूपटल का हिलना ।
3 . सुनामी – समुद्री क्षेत्र में भूकम्प के कारण तीव्र वेग वाली लहरें ।
4 . भूस्खलन – ढाल के सहारे मलवे ( अवसाद ) का तीव्र वेग से नीचे खिसकना ।
By आलोक वर्मा

मृदा by आलोक वर्मा

मृदा

तथ्य

शैलों के टूटने – फूटने तथा जीवावशेषों के सड़ने – गलने से निर्मित भू – पृष्ठ के ऊपरी भाग को मिट्टी कहते हैं । इसमें पौधों को उत्पन्न करने तथा पोषण करने की क्षमता पायी जाती है । यही कारण है कि मिट्टी मानव के । लिए अत्यधिक मूल्यवान है । मनुष्य की अधिकांश मूलभूत आवश्यकताएँ जैसे भोजन , वस्त्र , गृह आदि । प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी पर आधारित हैं । मानव सभ्यता की आधारशिला कृषि का सीधा सम्बन्ध मिट्टी से है । इसीलिए मिट्टी को मानव सभ्यता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । मिट्टी के निर्माण में मूल पदार्थ , जलवाय , धरातलीय दशाओं और प्राकृतिक वनस्पति का सर्वाधिक महत्त्व होता है । इन तत्त्वों की विभिन्नता के आधार पर विविध प्रकार की मिट्टियों का निर्माण होता है ।

  • मृदा का वर्गीकरण

भारत में विभिन्न प्रकार के उच्चावच , भू – आकृति , जलवायु परिमण्डल और वनस्पतियाँ पायी जाती है । इन विभिन्नताओं ने देश में अनेक प्रकार की मिट्टियों के विकास में योगदान दिया है ।

भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् ( ICAR ) ने भारतीय मृदाओं को उनकी प्रकृति और गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया है जो अमेरिका के कृषि विभाग ( USDA ) मृदा वर्गीकरण की पद्धति पर आधारित है । उत्पत्ति , रंग संयोजन तथा अवस्थिति के आधार पर भारत की मिट्रियों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है

( i ) जलोढ़ मिट्टी

जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदान और नदी घाटियों के विस्तृत भागों में पायी जाती है । ये मिट्टी देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 40 प्रतिशत भाग को ढके हुए है । इस मिट्टी में पोटाश की मात्रा अधिक और फॉस्फोरस की मात्रा कम पायी जाती है । पुरानी जलोढ़ मिट्टी को बाँगर और नवीन जलोढ़ मिट्टी को खादर कहते हैं ।

( ii ) काली मिट्टी

काली मिट्टी दक्कन के पठार के अधिकतर भाग पर पायी जाती है । इसमें महाराष्ट के कछ भाग , गुजरात , आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के कुछ भाग शामिल हैं । इस मिट्टी को ‘ रेगर ‘ तथा ‘ कपास वाली काली मिट्टी भा कहा जाता है । रासायनिक दृष्टि से काली मिट्टी में चूने , लौह , मैग्नीशिया तथा ऐलमिना के तत्त्व काफी मात्रामा पाए जाते हैं ।

( iii ) लाल और पीली मिट्टी

लाल मदा का विकास दक्कन के पठार के पूर्वी तथा दक्षिणी भाग में कम वर्षा वाले उन क्षेत्रों में हुआ है । जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें पायी जाती हैं । पश्चिमी घाट के गिरिपद क्षेत्र की एक लम्बी पट्टी में लाल दुमटी मृदा पायी जाती है । पीली और लाल मिट्टी ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भागों और मध्य गंगा के मैदान के दक्षिण भागों में पायी जाती है ।

( iv ) लैटेराइट मिट्टी

लेटेराइट मिट्टी उच्च तापमान और भारी वर्षा के क्षेत्रों में विकसित होती है । ये मिट्टी उष्ण कटिबन्धीय वर्षा । के कारण हुए तीन निक्षालन का परिणाम है । इस मिट्टी में जैव पदार्थ , नाइट्रोजन , फॉस्फेट और काल्सियम का कमी होती है तथा लौह – ऑक्साइड और पोटाश की अधिकता होती है । यह मिट्टी कनाटक , केरल , तमिलनाडु , मध्य प्रदेश और असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पायी जाती है ।

( v ) शुष्क मिट्टी

शुष्क मिट्टी का रंग लाल से लेकर किशमिशी तक होता है । यह सामान्यतः संरचना से बलुई और प्रकृति से लवणीय है । इस मिट्टी में नाइट्रोजन अपर्याप्त मात्रा में और फॉस्फेट सामान्य मात्रा में होता है , जबकि जैव पदार्थ बहुत कम मात्रा में मिलते हैं ।

( vi ) लवण मिट्टी

इस मिट्टी को ऊसर मिट्टी भी कहते हैं । इसमें सोडियम , पोटैशियम और मैग्नीशियम का अनुपात अधिक होता है । यह अनुर्वर होती है और इसमें किसी भी प्रकार की वनस्पति नहीं उगती । यह मिट्टी पश्चिमी गुजरात , पूर्वी तट के डेल्टाओं और पश्चिम बंगाल के सुन्दर वन क्षेत्र में मिलती है ।

( vii ) पीटमय मिट्टी

यह मिट्टी भारी वर्षा और उच्च आर्द्रता से युक्त उन क्षेत्रों में पायी जाती है जहाँ वनस्पति की वृद्धि अच्छी हो । अत : इन क्षेत्रों में मृत जैव पदार्थ बड़ी मात्रा में इकटे हो जाते हैं जो मृदा को जीवांश और पर्याप्त मात्रा में जैव तत्त्व प्रदान करते हैं । इस मिट्टी में जैव पदार्थों की मात्रा 40 से 50 प्रतिशत तक होती है । यह मिट्टी बिहार के उत्तरी भाग और उत्तराखण्ड के दक्षिणी भाग में पायी जाती है ।

( viii ) वन मिट्टी

यह मिट्टी पर्याप्त वर्षा वन वाले क्षेत्रों में मिलती है । इस मिट्टी का निर्माण पर्वतीय पर्यावरण में होता है । पर्यावरण में परिवर्तन के साथ मिट्टी का गठन और संरचना बदलती रहती है । घाटियों में यह दुमटी और पांशु होती है तथा ऊपरी ढालों पर यह मोटे कण वाली होती है ।

  • मृदा अवकर्षण

मुख्य रूप से मृदा अवकर्षण को मृदा की उर्वरता के हास के रूप में परिभाषित किया जाता है । इसमें मृदा का पोषण स्तर गिर जाता है तथा अपरदन और दुरुपयोग के कारण मृदा की गहराई कम हो जाती है । भारत में मृदा संसाधनों के क्षय का मुख्य कारक मृदा अवकर्षण है ।

  • मृदा अपरदन

अपरदनकारी शक्तियों द्वारा धरातल की मिट्टियों का कटाव या बहाव मृदा अपरदन कहलाता है । भारत में मृदा अपरदन की गम्भीर समस्या देखने को मिलती है । वर्षा ऋतु में नदियों के जल के साथ हजारों टन मिट्टी समद्र में बह जाती है । उल्लेखनीय है कि मृदा की एक इंच मोटी परत को विकसित होने में लगभग 500 साल लगते हैं , जबकि उनके नष्ट होने में बहुत कम समय लगता है । मृदा अपरदन के कारण भामि । की पैदावार घट जाती है जिसका सीधा प्रभाव मनुष्य के जीवन स्तर पर पड़ता है ।

  • ( क ) मृदा अपरदन के प्रमुख कारण निम्नलिखित है

( i ) निर्वनीकरण

( ii ) अनियन्त्रित पशुचारण

( iii ) अवैज्ञानिक कृषि कार्य

( iv ) वर्षा का स्वभाव

( v ) भूमि का ढाल

( vi ) पवन वेग

( vii ) मिट्टी की प्रकृति

  • ( ख ) मृदा अपरदन के प्रकार निम्नलिखित हैं

( i ) जल द्वारा – मृदा अपरदन –

1 . परत अपरदन

2 . नलिका अपरदन

( ii ) पवन द्वारा मृदा अपरदन –

1 . परत अपरदन

2 . नलिका अपरदन

( iii ) हिम द्वारा मृदा अपरदन ।

  • मृदा संरक्षण

अपरदन , जल – जमाव और खारापन मिट्टी की भीषण समस्याएँ हैं । इन समस्याओं से मिट्टी को सुरक्षित । करना आवश्यक है । मृदा संरक्षण का तात्पर्य ऐसे सभी उपायों से है , जिनसे मिट्टी तथा उसकी उर्वरा शक्ति सुरक्षित होती है । इन उपायों को दो भागों में बाँटा जा सकता है

1 . लघु उपाय — इसके अन्तर्गत ऐसे उपायों को सम्मिलित किया जाता है , जिनका उपयोग मिट्टी की सुरक्षा के लिए स्थानीय या व्यक्तिगत तौर पर किया जाता है । वन रोपण , समोच्च खेती , सीढ़ीदार खेती , फसल चक्र प्रणाली का अभिकरण आदि उपाय इसके अन्तर्गत आते हैं ।

2 . वृहत् उपाय — इसके अन्तर्गत मिट्टी संरक्षण के ऐसे उपाय आते हैं , जो राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के द्वारा चलाए जाते हैं । बाढ़ की रोकथाम , ऊसर भूमि सुधार , वन – रोपण , खड्ड , बीहड़ भूमि सुधार , स्थानान्तरणशील कृषि प्रमुख उपाय हैं । महत्त्वपूर्ण शब्दावली

1 . ह्यूमस – मृदा में पाए जाने वाले जीव – जन्तुओं व वनस्पति का गला – सड़ा अंश जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है ।

2 . शुष्क कृषि – किसी अर्द्ध – शुष्क क्षेत्र में बगैर सिंचाई के कृषि करना ।

3 . निक्षालन – आर्द्र प्रदेशों में वह प्रक्रिया जिसके द्वारा जैव तथा खनिज लवण , जैसे घुलनशील पदार्थ , मिटी की ऊपरी परत से , वर्षा के जल के स्राव के साथ निचली परत में प

4 . pH वैल्यू – यह मृदा की अम्लीयता और क्षारीयता के निर्धारण का एक माप होता है । यदि किसी मिट्टी का pH 7 से कम होता है तो उसे अम्लीय मिट्टी तथा 7 से अधिक होने पर क्षारीय मिट्टी कहते हैं । अम्लीय तथा क्षारीय दोनों प्रकार की मिट्टियाँ फसलों के लिए अनुपयुक्त होती हैं । अम्लीय मिट्टी में चूना डालकर और क्षारीय मिट्टी में जिप्सम डालकर इनका धीरे – धीरे उपचार किया जा सकता है ।

5 . मृदा – भूपटल की सबसे ऊपरी परत , जो पेड़ – पौधों की उत्पत्ति में सहायक है ।

6 . खादर – प्रतिवर्ष बाढ़ द्वारा निर्मित नवीन जलोढ़ मिट्टी ।

7 . बाँगर – पुराने अवसादों से निर्मित मिट्टी ।

8 . रेह – क्षारीय मिट्टी या क्षारीय भूमि को हिन्दी में रेह कहा जाता है ।

By Alok Verma

मुहावरे. For Hindi. UPTET. By ALOK VERMA

मुहावरे

” उत्तर प्रदेश की शिक्षक परीक्षा के लिए “

  1. अक्ल के पीछे लट्ठ लिये फिरना – मुर्खतापूर्ण कार्य करना
  2. अपना खिचड़ी अलग पकाना अलग – अलग रहना किसी को न मानना
  3. अपना उल्लू सीधा करना – स्वार्थ सिद्ध करना
  4. अपने मुँह मियाँ मिठू बनना – आत्मप्रशंसा करना ।
  5. अक्ल के घोड़े दौड़ाना – केवल कल्पनायें करते रहना ।
  6. आग – पानी साथ रखना – असम्भव कार्य करना
  7. आधी जान सूखना – अत्यन्त भय लगना
  8. आपे से बाहर होना – क्रोध से अपने वश में न रहना ।
  9. आग लगाकर तमाशा देखना – लड़ाई कराकर प्रसन्न होना
  10. आगे का पैर पीछे पड़ना – विपरीत गति या दिशा में चलना
  11. आटे – दाल की फिक्र होना – जीविका की चिन्ता करना
  12. आधा तीतर आधा बटेर – बेमेल चीजों का सम्मिश्रण
  13. आग लगने पर कुआँ खोदना – पहले से कोई उपाय न करना
  14. आव देखा न ताव – बिना सोचे विचारे
  15. आँख मैली करना – दिखावे के लिये बुरी तरह से रोना
  16. आँखें दिखाना – डराने – धमकाने के लिये रोष भरी दृष्टि से देखना
  17. आँखों में खून उतरना – अत्यधिक क्रोधित होना
  18. आग बबूला होना – अत्यधिक क्रोधित होना
  19. आसमान से गिरकर खजूर पर अटकना – एक मुसीबत से हटकर दूसरी मुसीबत में पड़ना
  20. आसमान टूटना – विपत्ति आना
  21. आँख का तारा – अत्यन्त प्रिय
  22. आटे दाल का भाव मालूम होना – वास्तविकता का ज्ञान होना
  23. आड़े हाथों लेना – खरी – खोटी सुनाना
  24. ईंट से ईंट बजाना – हिंसा का करारा जवाब देना ,
  25. खुलकर लड़ाई करना ईमान बेचना – विश्वास समाप्त करना
  26. ईद का चाँद होना – कभी – कभी दर्शन देना
  27. ईंट का जवाब पत्थर से देना – दुष्ट के साथ दुष्टता करना
  28. इज्जत उतारना – सम्मान को ठेस पहुँचाना
  29. इतिश्री करना – कर्त्तव्य पूरा करना
  30. इधर की उधर करना – चुगली करके भड़काना
  31. ईंट – ईंट बिक जाना – कंगाल हो जाना
  32. ईमान बेचना – सिद्धान्तों के विरुद्ध काम करना •
  33. इशारों पर नाचना – किसी की इच्छाओं का तुरन्त पालन करना ।
  34. उजाला करना – कुल का नाम रोशन करना
  35. उल्लू बोलना – उजाड़ होना
  36. उल्टी गंगा बहाना – नियम के विरुद्ध कार्य करना
  37. उल्टी खोपड़ी होना – उचित के विपरीत आचरण करने वाला
  38. उड़नछू होना – गायब हो जाना
  39. उबल पड़ना – एकदम गुस्सा हो जाना
  40. उखाड़ – पछाड़ करना – त्रुटियों दिखाकर कटुक्तियाँ करना
  41. उल्टे बाँस बरेली को – विपरीत कार्य करना
  42. उन्नीस – बीस का अंतर होना – थोड़ा बहुत अंतर होना
  43. उल्लू बनाना – मूर्ख बनाना
  44. अँगुली उठाना – दोष दिखाना
  45. अंगुली पकड़कर पहुंचा पकड़ना – थोड़ा प्राप्त हो जाने पर अधिक पर अधिकार जमाना
  46. अँगुली पर नचाना – संकेत पर कार्य कराना
  47. उड़ती चिड़िया के पंख पहचानना – कार्य – व्यापार को देखकर व्यक्तित्व को जान लेना
  48. ऊंची दुकान फीके पकवान – प्रसिद्ध स्थान की निकृष्ट वस्तु होना
  49. ऊँट के मुँह में जीरा – बहुत कम मात्रा में कोई वस्तु देना
  50. उल्लू सीधा करना – किसी को बेवकूफ बनाकर काम निकालना
  51. एक अनार सौ बीमार – एक वस्तु के लिये बहुत – से व्यक्तियों द्वारा प्रयत्न करना
  52. एक और एक ग्यारह होना – एकता में शक्ति होना
  53. एक हाथ से ताली नहीं बजती – झगड़ा एक ओर से नहीं होता
  54. एक पंथ दो काज – एक प्रयत्न से दो काम हो जाना
  55. ऐसी – तैसी करना – अपमानित करना / काम खराब करना
  56. एक की चार लगाना – छोटी बात को बड़ा – चढ़ाकर कहना
  57. एक ही लकड़ी से हॉकना – अच्छे बुरे की पहचान न करना
  58. ओखली में सिर देना – जानबूझकर अपने को जोखिम में डालना
  59. औंधी खोपड़ी – मूर्खता औकात पहचानना –
  60. सामर्थ्य पहचानना औंधे मुँह गिरना – धोखा खाना
  61. कन्धे से कन्धा मिलाना – सहयोग देना कच्चा
  62. चिट्ठा खोलना – गुप्त भेद खोलना
  63. कमर टूटना – हिम्मत पस्त होना
  64. कलेजा छलनी होना – कड़ी बात से जी दुःखना
  65. कलेजा थामना – दुःख सहने के लिये हृदय को कड़ा करना
  66. कलेजा धक – धक करना – भयभीत करना
  67. कलेजा निकालकर रख देना – सर्वस्व दे देना
  68. कलेजा मुँह को आना – अत्यधिक व्याकुल होना
  69. कलेजे पर पत्थर रखना – धैर्य धारण करना
  70. कसाई के खूटे से बाँधना – निर्दयी व्यक्ति को
  71. सौपना काँटों पर लोटना – ईया से जलना
  72. बेचैन होना कागज काला करना – व्यर्थ ही कुछ लिखना ।
  73. कागजी घोड़े दौड़ाना – कोरी कागजी कार्यवाही करना
  74. काठ का उल्लू होना – मूर्ख होना
  75. कान काटना – मात देना
  76. बढ़कर होना कान का कच्चा होना – बिना सोचे – विचारे दूसरों की बातों पर विश्वास करना
  77. कान खड़े होना – सचेत होना
  78. कान खाना – निरन्तर बाते करके परेशान करना
  79. कान पर जूं न रेंगना – बार – बार कहने पर भी प्रभाव न होना
  80. कान भरना – चुगली करना
  81. काया पलट देना – स्वरूप में परिवर्तन कर देना
  82. काला अक्षर भैंस बराबर – बिल्कुल अनपद
  83. कीचड़ उछालना – लाछन लगाना
  84. कएँ में बाँस डालना – बहुत तलाश करना
  85. कुत्ते की मौत मरना – बुरी तरह मरना
  86. कूप – मण्डूक होना – संकुचित विचार वाला होना
  87. कोल्हू का बैल – अत्यन्त परिश्रमी
  88. कोढ़ में खाज होना – एक दुःख पर दूसरा दुःख होना
  89. कलम का धनी – अच्छा लेखक काम तमाम करना
  90. मार डालना किरकिरा होना – विघ्न पड़ना
  91. किस्मत फूटना – बुरे दिन आना
  92. खून का चूँट पीना – बुरी लगने वाली बात सह लेना
  93. खेत रहना – युद्ध में मारा जाना
  94. खिचड़ी पकाना – गुप्त मंत्रणा करना
  95. ख्याली पुलाव पकाना – हवाई किले बनाना
  96. खाल उधेड़ना – कड़ा दण्ड देना
  97. खून सवार होना – किसी को मार डालने के लिये उद्यत होना
  98. खून पीना – तग करना
  99. खाक छानना – भटकना
  100. खरी – खोटी सुनाना – फटकारना
  101. खाक में मिलाना – नष्ट करना
  102. खून का प्यासा होना – जानी दुश्मन होना
  103. खून सूख जाना — भयभीत होना
  104. खून सफेद होना – उत्साह का समाप्त हो जाना , बहुत डर जाना
  105. खून – पसीना एक करना – कठोर परिश्रम करना
  106. खेल खिलाना – प्रतिपक्षी को समय देना ।
  107. गड़े मुर्दे उखाडना – बहुत पुरानी बाल दोहराना
  108. गागर में सागर भरना – थोड़े शब्दों में अधिक कहना
  109. गाल बजाना – डींग मारना
  110. गुड़ गोबर करना – काम बिगाड़ना
  111. घर का दीपक – घर की शोभा और कल की कीर्ति का बढ़ा
  112. घर की खेती – सहज में मिलने वाला पदार्थ
  113. घर फूक तमाशा देखना – क्षणिक आनन्द के लिये बहुत अधिक खर्च करना
  114. घाट – घाट का पानी पीना अनेक स्थलों का अच्छा – बुरा अनुगम करना / चालाक होना
  115. घाव पर नमक छिड़कना – दुःखी व्यक्ति के हृदय को और दुख पहुचा ।
  116. घाव हरा होना भूले दुःख की याद आना
  117. घी के दीये जलाना – खुशी मनाना
  118. घोड़े बेचकर सोना – निश्चिन्त होना
  119. घर में गंगा बहना – अच्छी चीज पास में ही मिल जाना
  120. घिग्घी बँधना – स्पष्ट बोल न सकना
  121. घोड़े पर चढ़े आना – उतावली में होन
  122. घट में बसना – मन में बसना घ
  123. ड़ी में तोला घड़ी में माशा – किसी बात का निर्णय स्थिरतापूर्वक न दें ।
  124. पाना घर काटे खाना – घर में कोई न होने से अकेलापन अखरना घाव हरा करना भूले दुख को याद दिलाना
  125. घर की मुर्गी दाल बराबर – सरलतापूर्वक प्राप्त वस्तु का मूल्य नहीं होता
  126. घुटने टेकना – अपनी हार – असमर्थता स्वीकार करना
  127. घूरे के दिन फिरना – किसी कमजोर आदमी के भी अच्छे दिन आना
  128. घर खीर तो बाहर भी खीर – यदि घर में इज्जत है तो बाहर भी होती है ।
  129. घोड़े दौड़ाना – अत्यधिक कोशिश करना
  130. घात लगाना – ताक में रहना
  131. चैन की बंसी बजाना – सुख से रहना
  132. चिकना घड़ा – निर्लज्ज
  133. चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना – डर जाना
  134. चार चाँद लगना – प्रतिष्ठा बढ़ना
  135. चिराग लेकर ढूँढना – कठिनाई से मिलना
  136. चंगुल में फँसना – मीठी – मीठी बातों से वश में करना
  137. चाँदी का जूता मारना – रिश्वत या घूस देना
  138. चाँद पर थूकना – भले व्यक्ति पर लांछन लगाना
  139. छाती भर आना – दिल पसीजना
  140. छाँह न छूने देना – पास तक न आने देना
  141. छठी का दूध याद दिलाना – संकट में डाल देना
  142. छूमन्तर होना – गायब हो जाना
  143. छक्का – पंजा भूलना – कुछ भी याद न रहना
  144. छाती ठोंककर – साहस करके
  145. जबान कैंची की तरह चलना – बढ़ – चढ़कर तीखी बातें करना
  146. जबान में लगाम न होना – बिना सोचे समझे , बिना लिहाज के बातें करना
  147. जलती आग में घी डालना – क्रोध भड़काना
  148. जान में जान आना – चैन मिलना
  149. जहर का चूंट पीना – कड़ी और कड़वी बात सुनकर भी चुप रहना .
  150. जिन्दगी के दिन पूरे करना – कठिनाई में समय बिताना
  151. जी चुराना – किसी काम या परिश्रम से बचने की चेष्टा करना
  152. जमीन पर पैर न रखना – अकड़कर चलना
  153. जोड़ – तोड़ करना – उपाय करना
  154. जली – कटी सुनाना – बुरा – भला कहना
  155. जूतियाँ चाटना – चापलूसी करना
  156. जान हथेली पर रखना – जिन्दगी की परवाह किये बिना खतरनाक कारी
  157. जैसा देश वैसा भेष – किसी स्थान का पहनावा , उस क्षेत्र विशेष अनुरूप होना
  158. जितने मुँह उतनी बातें – एक ही विषय पर अनेक मत होना
  159. जी खट्टा होना – विरत होना
  160. जहर की पुड़िया – झगड़ालू औरत
  161. जोंक होकर लिपटना – बुरी तरह पीछे पड़ना
  162. जलती आग में घी डालना – क्रोध को उद्दीप्त करना
  163. जी भर आना – दुःखी होना
  164. जहर उगलना – कड़वी बातें करना
  165. झण्डा गड़ना – विजय
  166. झकझोर देना – हिला देना , पूर्णतः त्रस्त कर देना
  167. झाडू फिरना / झाडू फिर जाना – ऐसा अपव्यय या नाश होना कि कछ भी बचा न रहे
  168. झूमने लगना – आनन्द – विभोर हो जाना
  169. टूट पड़ना – आक्रमण करना
  170. टिकट कटाना – किसी एक स्थान से कहीं और चल देना
  171. टेढ़ी खीर – कठिन काम या बाल
  172. टकासा जवाब देना – स्पष्ट उत्तर देना
  173. तलवे चाटना – खुशामद करना
  174. तिल का ताड़ करना – छोटी – सी बात को बड़ी बनाना
  175. तीन – तेरह करना – गायब करना
  176. तितर – बितर करना – तीन – पाँच करना बहाना बनाना , इधर – उधर की बात करना
  177. थाली का बैंगन होना – पक्ष बदलते रहना
  178. थूककर चाटना – त्यक्त वस्तु को पुन : ग्रहण करना
  179. थाह लेना – किसी गुप्त बात का भेद जानना
  180. दंग रह जाना — आश्चर्यचकित होना
  181. दाँत खट्टे करना – हरा देना ।
  182. दाँत पीसकर रह जाना – क्रोध रोक लेना
  183. दाँतों तले अंगुली दबाना – आश्चर्यचकित होना
  184. दिन दूनी रात चौगुनी होना – बहुत शीघ्र उन्नति करना
  185. दाल में काला होना – संदेह होना
  186. दिन – रात एक करना – चौबीसों घण्टे किसी काम में लगे रहना
  187. दाँत काटी रोटी – घनिष्ठ मित्रता
  188. दिल का गुबार निकालना – मन की बात कह देना
  189. दो दिन का मेहमान – जल्दी मरने वाला
  190. तकदीर फूट जाना — भाग्यहीन होना
  191. दम भरना – दावा करना
  192. दाहिना हाथ – महत्वपूर्ण संबल .₹
  193. दूध के दाँत न टूटना – ज्ञान व अनुभव न होना
  194. धूप में बाल सफेद होना – अनुभवहीन होना
  195. धज्जियाँ उड़ाना – दुर्गति करना ।
  196. ध्यान टूटना – एकाग्रता भंग होना
  197. धौंस जमाना – रौब दिखाना
  198. नंगा कर देना – वास्तविकता प्रकट करना।
  199. नंगे हाथ – खाली हाथ
  200. नमक मिर्च लगाना – बढ़ा – चढ़ाकर कहना
  201. निन्यानवे के फेर में पड़ना – धन संग्रह की चिन्ता में पड़ना
  202. नौ दो ग्यारह होना – भाग जाना नाच नचाना – मनचाही करना
  203. नाक – भौं चढ़ाना – असन्तोष प्रकट करना नीला – पीला होना – गुस्सा होना
  204. नाकों चने चबाना – बहुत तंग होना ।
  205. नाक में नकेल डालना – वश में करना
  206. नमक अदा करना – उपकारों का बदला चुकाना
  207. नाक कटना – इज्जत चली जाना
  208. नाक का बाल होना – किसी का प्रिय होना
  209. नाक रगड़ना – विनती करना
  210. पत्थर की लकीर होना – दृढ़ विश्वास होना
  211. पहाड़ टूट पड़ना – मुसीबत आना
  212. पाँचों अंगुली घी में होना – पूर्ण लाभ में होना
  213. पेट में दाढ़ी होना – चालाक होना
  214. पीठ में छुरा भोंकना – विश्वासघात करना
  215. पैरों पर खड़ा होना – स्वावलम्बी होना
  216. पगड़ी रखना – इज्जत रखना ।
  217. पेट में चूहे दौड़ना – भूख लगना
  218. पापड़ बेलना – विषम परिस्थितियों से गुजरना ।
  219. पीठ पर हाथ रखना – पक्ष मजबूत बनाना
  220. पाँव तले जमीन खिसकना – घबरा जाना
  221. पाँव फूंक – फॅक कर रखना – सतर्कता से कार्य करना ।
  222. पीठ दिखाना – पराजय स्वीकार करना
  223. पानी में आग लगाना – असम्भव कार्य करना
  224. फीका लगना – हल्का प्रतीत होना
  225. फूटी आँखों न भाना – बिल्कुल अच्छा न लगना
  226. फट पड़ना – एकदम गुस्से में आ जाना
  227. बाँछे खिलना – अत्यन्त प्रसन्न होना
  228. बाल बाँका न होना – कुछ भी हानि न होना
  229. बट्टा लगाना – कलंक लगना बाग – बाग होना – अति प्रसन्न होना
  230. बच्चों का खेल – सरल काम
  231. बखिया उधेड़ना – भेद खोलना
  232. टोपी उछालना – इज्जत से खिलवाड़ करना .
  233. बायें हाथ का खेल – अति सरल काम
  234. बात का धनी होना – वचन का पक्का होना
  235. बेसिर पैर की बात करना ऊल – जुलूल बातें करना ।
  236. बड़े घर की हवा खाना – जेल जाना
  237. बेपेंदी का लोटा – दुलमुल , अस्थिर विचारों वाला
  238. बल्लियों उछलना – बहुत खुश होना ।
  239. बाजार गर्म होना – काम – धंधा तेज होना
  240. बरस पड़ना – अति क्रुद्ध होकर डॉटना
  241. बासी कढ़ी में उबाल आना – उचित समय बीत जाने पर इच्छा होना
  242. बिल्ली के गले में घण्टी बाँधना – स्वयं को संकट में डालना
  243. भण्डा फोड़ना – रहस्य खोलना , भेद प्रकट करना
  244. भविष्य पर आँख होना – आगे का जीवन सुधारने के लिये प्रयत्नशील रहना
  245. भीगी बिल्ली बनना – डर जाना
  246. भाड़े का टटू – पैसे लेकर काम करने वाला .
  247. भाड़ झोंकना – स्वय समय खोना
  248. भैंस के आगे बीन बजाना – बेसमझ आदमी को उपदेश देना
  249. भागीरथ प्रयत्न करना – बहुत प्रयास करना
  250. मन की मन में रह जाना – इच्छाएँ पूरी न होना
  251. माथे पर शिकन आना – मुखाकृति से अप्रसन्नता व्यक्त होना
  252. मीठी छुरी चलाना – प्यार से मारना .
  253. राई का पहाड़ बनाना – बढ़ा – चढ़ाकर कहना
  254. रातों की नींद हराम होना – चिन्ता , भय , दुःख आदि के कारण रातभर नींद न आना
  255. रोड़ा अटकाना – बाधा डालना
  256. रास्ते का काँटा बनना – मार्ग में बाधा डालना
  257. रीढ़ टूटना – आधारहीन रहना
  258. रंग बदलना – बदलाव होना
  259. रोंगटे खड़े होना – भय से रोमांचित हो जाना ।
  260. रास्ते पर लाना – सुधार करना .
  261. रो – धोकर दिन काटना – जैसे – तैसे जीवन व्यतीत करना ।
  262. रंग में भंग होना – खुशी के अवसर पर बुरा होने से खुशी का दुःख में बदल जाना
  263. रास्ता नापना – चले जाना
  264. रंग जमाना – धाक जमाना
  265. लंगोटी बिकवाना – दरिद्र कर देना
  266. लकीर का फकीर होना – रूढ़िवादी होना
  267. लेने के देने पड़ना – लाभ के बदले हानि
  268. लोहे के चने चबाना – कठिनाइयों का सामना करना
  269. लौ लगाना – प्रेम में मग्न हो जाना / आसक्त हो जाना
  270. ललाट में लिखा होना – भाग्य में बदा होना
  271. लंगोटिया यार – बचपन की दोस्ती
  272. लटू होना – किसी पर रीझना
  273. ठगा – सा रह जाना — मार डालना ।
  274. लम्बी तानकरं सोना – निष्क्रिय होकर बैठना .
  275. लाल – पीला होना – गुस्से में होना
  276. लल्लो – चप्पो करना – चिकनी – चुपड़ी बातें करना
  277. लहू के आँसू पीना – दुःख सह लेना
  278. लुटिया डुबोना – कार्य खराब कर देना
  279. जान के लाले पड़ना – जान पर संकट आ जाना
  280. वकालत करना – पक्ष का समर्थन करना ।
  281. वक्त की आवाज – समय की पुकार .
  282. शहद लगाकर चाटना – किसी व्यर्थ की वस्तु को सम्भालकर रखना
  283. शैतान के कान कतरना / काटना – बहुत चालाक होना
  284. शान में बट्टा लगाना – शान घटना
  285. शेर की सवारी करना – खतरनाक कार्य करना
  286. शिकंजा कसना – नियंत्रण और कठोर करना
  287. सफेद झूठ – सर्वथा असत्य
  288. साँप को दूध पिलाना – शत्रु पर दया करना
  289. साँप सूंघना – निष्क्रिय या बेदम हो जाना
  290. सिर आँखों पर – विनम्रता तथा सम्मानपूर्वक ग्रहण करना
  291. सिर ऊँचा करना – सम्मान बढ़ाना
  292. सोने की चिड़िया – बहुत कीमती वस्तु
  293. सिर उठाना – विरोध करना
  294. सिर पर भूत सवार होना – धुन लग जाना
  295. सिर मुंडाते ओले पड़ना – काम शुरू होते ही बाधा आना
  296. सिर पर हाथ होना – सहारा होना
  297. सिर झुकाना – पराजय स्वीकार करना
  298. सिर खपाना – व्यर्थ ही सोचना
  299. सिर पर कफन बाँधना – बलिदान देने के लिये तैयार होना
  300. सिर गंजा करना – बुरी तरह पीटना
  301. सिर पर पाँव रखकर भागना – तुरन्त भाग जाना
  302. हाथ मलना – अपनी विवशता व्यक्त करना ।
  303. हाँ में हाँ मिलाना – चापलूसी करना
  304. हाथ के तोते उड़ना – अचानक किसी अनिष्ट के कारण स्तब्ध रह जाना ।
  305. हाथ – पाँव फूलना – भय से घबरा जाना
  306. हाथ पीले करना – विवाह करना
  307. हाथ को हाथ नहीं सूझना – बहुत अंधेरा होना
  308. हाथ मलते रह जाना – पश्चाताप होना
  309. होश ठिकानें होना – अक्ल ठिकाने होना
  310. होश उड़ जाना – घबरा जाना
  311. हाथ पर हाथ रखकर बैठना – खाली बैठना
  312. हाथ धो बैठना – खो बैठना
  313. हवाई किले बनाना – बड़े – बड़े ख्वाब देखना
  314. हवा हो जाना — भाग जाना
  315. हाथ साफ कर जाना – चुरा लेना
  316. हवा का रुख पहचानना – परिस्थिति को भाँपना
  317. हथेली पर सरसों बोना – थोड़े समय में कठिन काम करना
  318. हवा लगना – बुरी संगति का प्रभाव होना
  319. हक्का – बक्का रह जाना – हैरान रह जाना
  320. हुक्का पानी बन्द करना – जाति से बाहर करना
  321. हवा के घोड़े पर सवार होना – शीघ्रता करना

by Alok Verma

पर्यावरण संस्थानो के नाम व स्थान। For UPTET by Alok Verma

परीक्षा उपयोगी For UPTET

“पर्यावरण संस्थान”

  • भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण कोलकाता
  • भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण कोलकाता
  • भारतीय वन सर्वेक्षण देहरादून
  • वन अनुसंधान संस्थान देहरादून
  • केन्द्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान. देहरादून
  • लकड़ी विज्ञान और अनुसंधान संस्थान बंगलुरु
  • पारिस्थितिकी विज्ञान केन्द्र. बंगलुरु
  • पर्यावरण शिक्षा केन्द्र. चेन्नई एवं बंगलुरु
  • केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड. नई दिल्ली
  • जल प्रबंधन अभियांत्रिकी संस्थान

नई दिल्ली

  • केन्द्रीय मृदा संरक्षण संस्थान. नई दिल्ली
  • हिमालय वन अनुसंधान संस्थान शिमला
  • वन उत्पादकता केन्द्र. रांची
  • राष्ट्रपति बनस्पति विज्ञान संस्थान। लखनऊ
  • केन्द्रीय पक्षी शोध संस्थान।। इज़्ज़तनगर बरेली
  • केन्द्रीय वर्षा वन अनुसंधान संस्थान। जोरहट (असम)
  • सामाजिक वानिकी एवं पारिस्थितिक पुनर्स्थापना केन्द्र।। इलाहाबाद
  • वानिकी अनुसंधान तथा मानव संसाधन विकास संस्थान। छिंदवाड़ा
  • उष्ण कटिबंधीय संस्थान। जबलपुर
  • उच्च अक्षांश अनुसंधान प्रयोगशाला। गुलमर्ग
  • भारतीय प्राणी कल्याण संस्थान। वल्लभगढ़ (हरियाणा)
  • सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र कोयंबटूर
  • खनन पर्यावरण केन्द्र। अहमदाबाद
  • उष्ण कटिबंधीय वनस्पति उद्यान एवं अनुसंधान केन्द्र। तिरुअंतपुरम
  • राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी शोध संस्थान ( NEERI) नागपुर

By Alok Verma

शिक्षा और पर्यावरण शिक्षा

शिक्षा और पर्यावरणीय शिक्षा

( Education and Environmental Education )

पर्यावरणीय शिक्षा का अर्थ एवं परिभाषा

पर्यावरण एवं व्यापक सम्प्रत्यय है । मनुष्य जिस प्राकतिक , सामाजिक , सांस्कृतिक , धार्मिक , राजनैतिक एवं स्थातया में रहता है , वह सब उसका पर्यावरण होता है । परन्तु पर्यावरणीय शिक्षा केवल उसके प्राकृतिक पयावरण तक का जानकारी तक सीमित होती है , यह बात दूसरी है कि इसके अन्तर्गत उसके प्राकृतिक पर्यावरण के उसके सामाजिक , सांस्कृतिक , धार्मिक , राजनैतिक और आर्थिक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है ।

वैज्ञानिक आविष्कारों ने उसकी भौतिक आवश्यकताएँ और अधिक बढ़ा दी हैं । इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है । अब संसार भर में इस बात की चिन्ता उत्पन्न हो गई है कि कहीं ये प्राकृतिक संसाधन समाप्त न हो जाएँ और आगे आने वाली पीढ़ी इनसे वंचित न हो जाए । अत : इसके संरक्षण के लिए प्रयत्न किए जा रहे हैं । दूसरी तरफ औद्योगीकरण के कारण वायु और जल प्रदूषित हो रहे हैं । परिणाम यह है कि मनुष्यों को जीने के लिए शुद्ध वायु एवं शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है । अत : प्रदूषण को भी रोकने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं । इन प्रयत्नों में एक प्रयत्न पर्यावरणीय शिक्षा है । अमरीका के पर्यावरणीय शिक्षा अधिनियम , 1970 में पर्यावरणीय शिक्षा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है —–

पर्यावरणीय शिक्षा वह शैक्षिक प्रक्रिया है जो मानव को उसके प्राकृतिक एवं मानव निर्मित वातावरण के सम्बन्धों का ज्ञान कराती है । इसमें जनसंख्या , प्रदूषण , संसाधनों का विनियोग , संरक्षण , यातायात , तकनीकी और नगरीय तथा ग्रामीण नियोजन का मनुष्य के सम्पूर्ण पर्यावरण से सम्बन्ध भी निहित है । लेकिन देश में पर्यावरणीय शिक्षा के दो पहल हैं — एक प्राकृतिक संसाधनों और उनके संरक्षण का ज्ञान और दूसरा प्राकृतिक पर्यावरण और उसे दूषित होने से बचाने के उपायों का ज्ञान । इस शिक्षा के उद्देश्य और पाठ्यक्रम की दृष्टि से इसे निम्नलिखित रूप में परिभाषित करना चाहिए

पर्यावरणीय शिक्षा वह शिक्षा है जिसके द्वारा बच्चों , युवकों और प्रौढों को प्राकतिक संसाधनों के दोहन और प्रकति प्रदूषण के कारणों और उनके दुष्परिणामों से परिचित कराया जाता है और साथ ही उन्हें प्राकृतिक संसाधनो के संरक्षण और प्रकृति प्रदूषण की रोकथामा की विधियाँ बताई जाती हैं ।

यहाँ यह बात समझ लेनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का अर्थ उनके प्रयोग को समाप्त करने से नहीं है अपित व्यक्तियों को उनके विवेकपूर्ण उपयोग की शिक्षा देने से है जिससे उनका लाभ अधिक से आधिक तक व्यक्तियों को हो सके । और प्रकति प्रदूषण का अर्थ प्राकतिक कारणों द्वारा हान बाल प्रदषण एवं मनुष्य के द्वारा किए जाने वाले प्रदूषण दोनों से है । प्रदषण किसी कारण से हो . उसको समाप्त करना आवश्यक है ।

पर्यावरणीय शिक्षा के उद्देश्य

पर्यावरणीय शिक्षा का मूल उद्देश्य है , प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को रोकना और प्राकति प्रदूषित होने से बचाना । इस उद्देश्य को निम्नलिखित रूप में विस्तृत किया गया है

  1. बच्चों , युवकों और प्रौढ़ों को प्राकृतिक संसाधनों और प्राकृतिक पर्यावरण का ज्ञान कराना
  2. उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषित होने के दुष्परिणामों का ज्ञान ।
  3. उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषित होने के कारणों का ज्ञान
  4. उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषित होने से बचाने के उपाय कराना और उनके अनुपालन की ओर प्रवृत्त करना ।
  5. उनमें प्राकृतिक असन्तुलन और प्रदूषण की रोकथाम के प्रति अभिवृत्ति का विकास करना ।
  6. उनमें सफाई के प्रति अभिवृत्ति का विकास करना ।
  7. उनमें जनहित की अभिवृत्ति का विकास करना ।

यही नहीं बल्कि पर्यावरण शिक्षा एक व्यापक तथा एकीकृत शिक्षा प्रयास है जिसमें व्यवहार परिशोधन के तीनों ही पक्ष – ज्ञानात्मक पक्ष , भावात्मक पक्ष तथा क्रियात्मक पक्ष समाहित रहते हैं । पर्यावरण शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य विश्व । जनसंख्या को पर्यावरण तथा उससे सम्बन्धित समस्याओं के प्रति सजग व करियाशील करना है जिससे वे पर्यावरण । संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता ( Commitment ) की भावान का विकास करके इस दिशा में यथासम्भव प्रयास कर सकें । । पर्यावरण शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों को अगआरंकित ढंग से लिखा जा सकता है ।

1 . पर्यावरण के प्रति जागरुकता – पर्यारवण शिक्षा का प्रथम उद्देश्य सभी को पर्यावरण के प्रति जागरुकता तथा संवेदनशील बनाना है । सभी व्यक्तियों तथा सामाजिक समूहों को समग्र पर्यावरण तथा उसकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील तथा जागरुक बनाने में सहायता करना पर्यावरण शिक्षा का पहला कदम होगा ।

2 . पर्यावरण का ज्ञान – पर्यावरण शिक्षा का दूसरा उद्देश्य सभी को पर्यावरण के सम्बन्ध में जानकारी कराना । है । अत : व्यक्तियों तथा सामाजिक समूहों को पर्यावरण , उसमें होने वाले परिवर्तन तथा इन परिवर्तनों के फलस्वरूप । आने वाली समस्याओं क आज्ञान कराना ही पर्यावरण शिक्षा का दूसरा उद्देश्य है ।

3 . पर्यावरण के प्रति अभिवृत्ति – पर्यावरण शिक्षा का एक अन्य उद्देश्य जनसाधारण में पर्यावरण तथा उसके । संरक्षण के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना है । इसके लिए व्यक्तियों तथा सामाजिक समूहों में पर्यावरण । सम्बन्धी सामाजिक मूल्यों , पर्यावरण के प्रति सद्भावना तथा पर्यावरण संरक्षण व उसमें सुधार के लिए अभिप्रेरणा को विकसित करना चाहिए ।

4 . पर्यावरण सुधार में सहभागिता – पर्यावरण शिक्षा को जनसाधारण में पर्यावरण संबंधी समस्याओं के समाधान । में अपनी सक्रिय भागीदारी तथा उत्तरदायित्व का बोध कराना भी निहित है । इसके लिए व्यक्तियों तथा सामाजिक समूही में पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करनी होगी तथा पर्यावरण प्रदूषण को रोकने व पर्यावरण सुधार । की दिशा में उपयुक्त कदम उठाने के लिए तत्पर बनाना होगा । ।

5 . पर्यावरण सुधार का कौशल – पर्यावरण संबंधी समस्याओं का समाधान करने के लिए पयावरण सभा व उसमें सुधार करने की निपुणता को भी विकसित करना पर्यावरण शिक्षा का एक प्रमख उद्देश्य है । व्यक्तियों तथा । सामाजिक समूहों में पर्यावरण संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक कौशलों से युक्त करना होगा ।

6 . पर्यावरण मूल्यांकन – पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य पर्यावरण तथा उसमें सुधार हेतु किये जाने वाले प्रयासा का मूल्याकन करने की क्षमता विकसित करना भी है । पर्यावरण शिक्षा को व्यक्तियों तथा सामाजिक समूहों में पर्यावरण तत्वा , परिस्थिति के संतुलन तथा पर्यावरण संरक्षण व सुधार की दिशा में किये जाने वाले प्रयासों का मूल्यांकन सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक , सौंदर्यमूलक तथा शैक्षिक कारकों के संदर्भ में करने की योग्यता विकसित करने में सहायता प्रदान करनी चाहिए । जानात्मक , भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों से सम्बन्धित पर्यावरण शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों का चित्र मशाल किया गया है ।

पर्यावरणीय शिक्षा का पाठ्यक्रम

पर्यावरणीय शिक्षा के पाठ्यक्रम पर विद्वान , विशेषकर शिक्षाविद् एकमत नहीं है , किन्तु अब तक देश – विदेश में इसके जो सामान्य पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं , उनमें मुख्य तत्व निम्नलिखित है

1 . प्राकृतिक सम्पदा और प्राकृतिक पर्यावरण की जानकारी , मानव जीवन में प्राकृतिक सम्पदा और शुद्ध प्राकृतिक पर्यावरण की उपयोगिता । ।

2 . प्राकृतिक सम्पदा के दोहन से होने वाले दुष्परिणामों की जानकारी – वनों के दोहन ( कटने ) से वनों से उपलब्ध होने वाली सामग्री कम हो रही है , पारिस्थितिकीय ( Ecological ) सन्तुलन बिगड़ रहा है , वायु प्रदूषित हो रही है , वर्षा की कमी हो रही है और मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है ।

3 . प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषित होने के दुष्परिणामों की जानकारी

( i ) सुद्ध पेयजल और शुद्ध वायु की कमी ।

( ii ) शुद्ध खाद्य पदार्थों के उत्पादन में बाधा । । .

( iii ) उचित पोषण और स्वास्थ्य विकास में बाधा ।

4. प्राकृतिक सम्पदा के दोहन के कारणों की जानकारी ।

  • ( i ) वैज्ञानिक आविष्कार ।
  • ( ii ) बढ़ती हुई भौतिक आवश्यकताएँ ।
  • ( iii ) अनावश्यक प्रयोग ।
  • ( iv ) बढ़ती हुई जनसंख्या ।

5. प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषित होने के कारणों की जानकारी ।

  • ( i ) वनों का कटना ।
  • ( ii ) औद्योगीकरण ।
  • ( iii ) तेल से चलने वाले वाहन ।
  • ( iv ) रासायनिक पदार्थों का प्रयोग ।
  • ( v ) बढ़ती हुई जनसंख्या ।

6. प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण के उपायों की जानकारी ।

  • ( i ) वनों में जितने पेड़ काटे जाएँ , वहाँ उससे अधिक पेड़ लगाए जाएं ।
  • ( ii ) खनिजों का प्रयोग विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए । इनके विकल्प के रूप में प्लास्टिक क _ को बढ़ावा दिया जाए ।
  • ( iii ) ईंधन खनिजों का कार्य सूर्य ऊर्जा से लिया जाए ।
  • ( iv ) वर्षा के पानी को बाँधों , झीलों और तालाबों में संग्रहीत किया जाए ।
  • ( v ) जल का दुरुपयोग न किया जाए ।

7 . प्राकृतिक पर्यावरण को प्रदषित होने से बचाने के उपायों की जानकारी ।

  • ( i ) वनों को न काटा जाए एवं वृक्षारोपण किया जाए ।
  • ( ii ) उद्योगों से निकलने वाले धुएँ और विषैली गैसों को वैज्ञानिक विधियों से कम किया जाए , उन्हें अप्रभावी कर वायु को प्रदूषित होने से बचाया जाए ।
  • ( iii ) उद्योगों से निकलने वाले जहरीले पदार्थों , ग्राम व नगरों के गन्दे पानी और कचरे और मरे हुए जीव जन्तुओं को नदियों में न पहाया जाए और जल प्रदूषण को रोका जाए , झीलों तालाबों और कुओं के पानी को रासायनिक विधियों द्वारा शुद्ध किया जाए ।
  • ( iv ) तेल से चलने वाले वाहनों को प्रदूषण मुक्य किया जाए और वायु प्रदूषण से रोका जाए ।
  • ( v ) जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण किया जाए ।

पर्यावरणीय शिक्षा के साधन

पर्यावरणीय शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली शिक्षा है । आज पूरे संसार में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और प्राकृतिक पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त करने की नई – नई सामान्य और वैज्ञानिक विधियों की खोज की जा रही है , मनुष्यों को उनकी लगातार जानकारी देना आवश्यक है । भारत में पर्यावरणीय शिक्षा के मुख्य माध्यम है — औपचारिक सिक्षा , निरौपचारिक शिक्षा , अनौपचारिक शिक्षा , प्रौढ़ शिक्षा , जनसंचार के माध्यम और स्वैच्छिक संस्थाएँ ।

पर्यावरणीय शिक्षा का महत्व एवं आवश्यकता

आज विज्ञान के बढ़ते हुए चरण , औद्योगिक और बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण संसार भर में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है , पारिस्थितिकीय असन्तुलन बढ़ रहा है और प्राकृतिक प्रदूषण बढ़ रहा है । इसकी रोकथाम के लिए जहाँ एक ओर सरकारी नियम एवं कानून बनाए जा रहे हैं , वहाँ दूसरी ओर लोगों को इसके प्रति जागरुक करने के लिए पर्यावरणीय शिक्षा का सहारा लिया जा रहा है । सच बात यह है कि सारे कार्य सरकारी नियम और कानूनों से सम्भव नहीं होते , उसके लिए जनजागरण भी जरूरी होता है और इस कार्य में शिक्षा एक अहम् भूमिका निभाती है । आज के सन्दर्भ में पर्यावरणीय शिक्षा का बड़ा महत्व है , उसकी बड़ी आवश्यकता है |

1 . प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण के लिए – हम देख रहे हैं कि मनुष्य अपनी भौतिक आवश्यकताओं की । पर्ति के लिए प्राकृतिक सम्पदा का बड़ी तेजी से दोहन कर रहा है और यदि यही गळा पबी को बमापी भावी पीढ़ी | के लिए कुछ भी प्राकृतिक सम्पदा शेष नहीं रहेगी । मनुष्यों को प्राकृतिक सम्पदा के सीमित प्रयोग की ओर अग्रसर करने और उसे भावी पीढ़ियों के लिए बचाने रखने के लिए पर्यावरणीय शिक्षा का बड़ा महत्व है . उसकी बड़ी आवश्यकता

2. प्रकति प्रदूषण की रोकथाम के लिए – आज संसार में वनों के काटने औद्योगिक संस्थानों को चलान । रहती हई जनसंख्या क कारण गन्दगा फलने से हमारा प्राकतिक पर्यावरण – जल वाय मिट्टी आदि सभा प्रदूष है । इस प्रदषण की रोकथाम क लिए पर्यावरणीय शिक्षा का बड़ा महत्व है ।

3. बच्चों के उचित पोषण और स्वास्थ्य विकास के लिए – मनष्य को जीने के लिए शुद्ध पाके र्य का प्रकाश और खाद्यान्न का आवश्यकता होती है । स्पष्ट है कि बच्चों के जित गोषण और स्वास्थ्य विकास की दृश्टि से पर्यावरण का बड़ा महत्व है।

4 . जन कल्याण और आर्थिक प्रणाली की रक्षा के लिए – आज अधिकतर मनुष्य केवल अपने स्वार्थ पारा साचत ह , जनहित और जन कल्याण की नहीं । और बडेमजे की बात यह है कि इस स्वार्थ की आँधी में व अपना भी अहित कर बैठते है । वे नहीं सोच पाते कि उनके कारण प्राकृतिक ससाधन कम हो रहे हैं , जिससे आगे चलकर अर्थव्यवस्था ही चरमरा जाएगी । तब कहना न होगा कि जनकल्याण आर आथिक प्रणाला का लम्बे समय तक बनाए रखने के लिए पर्यावरणीय शिक्षा का बड़ा महत्व है ।

भारत में पर्यावरणीय शिक्षा का विकास

भारतीय तो अति प्राचीन काल से प्राकतिक पर्यावरण के प्रति बड़े सचेत रहे हैं । वैदिक ऋचाओं में प्रकृति के गुणों का बखान और उसकी दैवीय रूप में प्रार्थना की गई है । वैदिक काल में वनस्पतियों को ईश्वर की अद्वितीय देन माना जाता था और पेड – पौधों को काटना जीव हत्या माना जाता था । इतना हा नहा आपतु नादया के जल में । मल विसर्जन करने का निषेध था , वायु को दृषित करने का निषेध था । नित्य हवनों का विधान वायु , मन और आत्मा को शुद्ध करने के इले ही किया गया था । पर जैसे – जैसे देश की जनसंख्या बढ़ती गई और भौतिकवादी सभ्यता बढ़ती गई तैसे – तैसे हम प्रकृति की रक्षा के स्थान पर उसका दोहन करने लगे , उसे शुद्ध रखने के स्थान पर उसे प्रदूषित करने लगे ।

हमारे देश में जहाँ तक प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण और प्रकृति को प्रदूषण से बचाने की बात है । इसके लिए 1986 में पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम ( Environmental Protection Act ) बनाया गया । इस समय हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रदषण नियन्त्रण से सम्बन्धित अनेक योजनाएँ चल रही हैं जिन्हें केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारें केन्द्रीय तथा प्रान्तीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्डो के माध्यम से चला रही हैं । इन कार्यक्रमों को संचालन में अनेक संस्थाओं – भारतीय वानिकी अनसन्धान एवं सरक्षा परिषद , भारतीय वन्य जीवन संस्थान भारीय बसम्पति बारतीय जन्तु सर्वेक्षण संस्थान आदि का बड़ा सहयोग है । और जहाँ तक स्कूलों में पर्यावरणीय शिक्षा का प्रश्न है , हमारे देश में इस विषय पर सर्वप्रथम 1981 में भारतीय पर्यावरण संस्थान , नई दिल्ली ने एक पुस्तक प्रकाशित की । इस पुस्तक में पर्यावरणीय शिक्षा के सम्बन्ध में जो सुझाव दिए गए हैं उनमें मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं

( 1 ) पर्यावरणीय शिक्षा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिससे छात्रों में पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत हो ।

( 2 ) पर्यावरणीय शिक्षा ऐसी हो जिससे मनुष्य यह अनुभऽ करें कि वे स्वयं प्रकृति का एक अंग हैं ।

( 3 ) पर्यावरणीय शिक्षा ऐसी हो जो नागरिकों को पर्यावरण सम्बन्धी राष्ट्रीय नीति , नियम एवं कानूनों की जानकारी

( 4 ) शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिए विभिन्न पाठ्यक्रम बनाए जाएँ प्राथमिक स्तर पर केवल स्थानीय पर्यावरण का ज्ञान कराया जाए , माध्यमिक स्तर पर पर्यावरण और मानव के सम्बन्धों को स्पष्ट किया जाए और उच्च स्तर पर पर्यावरण सम्बन्धी विशिष्ट ज्ञान एवं प्रशिक्षण दिया जाए ।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति , 1986 में पर्यावरणीय शिक्षा के महत्व को स्वीकार किया गया और शिक्षा के हर पर प्राथमिक , माध्यमिक और उच्च शिक्षा में उसकी व्यवस्था की घोषणा की गई । इसके लिए स्कली पाठ्यक्रम । निर्माण का उत्तरदायित्व एन . सा . ई . आर . टा . का और उच्च स्तर के पाठयक्रम के निर्माण का उत्तरदायित्व इच्छुक विश्वविद्यालयों को सौंपा गया । एन . सी . ई . आर . टी . ने प्राथमि और माध्यमिक स्तर की शिक्षा के लिए पर्यावरणीय शिक्षा के पाठयक्रम तैयार किए आर साथ हा तत्सम्बन्धी पाठ्यपुस्तकें और निर्देशन सामयी तैयार की । 1988 – 89 में कन्द्र दारा ‘ स्कली शिक्षा का पयावरणाय स्वरूप प्रदान करना ‘ योजना शरू की गई । कळ विश्वविद्यालयों ने पर्यावरण विज्ञान को स्नातक स्तर के एक विषय और परास्नातक के एक सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के रूप में शुरू किया है । जनसाधारण को पर्यावरणीय शिक्षा जनसंचार के माध्यमों से दी जा रही है ।

भारत में पर्यावरणीय शिक्षा की समस्याएँ एवं उनके समाधान

पर्यावरण की समस्या विश्व की समस्या है । भारत के लिए यह समस्या और भी अधिक भयंकर है क्योंकि यहा का जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है । इस समस्या के समाधान के लिए ही पर्यावरणीय शिक्षा का विधान किया गया है । यूँ तो हमारे देश में इसे प्राथमिक शिक्षा में अनिवार्य विषय के रूप में शुरू किया जा चुका है , परन्तु अभी भा विद्वान इस विषय में एकमत नहीं हैं कि इस शिक्षा की विषय – सामग्री क्या हो , इसे कब शुरू किया जाए और यह शिक्षा कैसे दी जाए । भारत में पर्यावरणीय शिक्षा की ये ही मूलभूत समस्याएँ हैं ।

( ii ) पर्यावरणीय शिक्षा की विषय – सामग्री की समस्या

समस्या का स्वरूप – प्रथमत : तो विद्वान इसी विषय में एकमत नहीं हैं कि इसे स्कूली पाठ्यचर्या का एक अलग विषय बनाया जाए अथवा इसे अन्य विषयों – भाषा , भूगोल , अर्थशास्त्र एवं विज्ञान के साथ जोड़कर पढ़ाया जाए । दूसरे हमारे देश में एन . सी . आर . टी . ने पर्यावरणीय शिक्षा का जो पाठ्यक्रम बनाया है , वह अति विस्तृत है , उससे अधिकतर शिक्षाविद् असहमत हैं ।

समस्या के कारण – इस समस्या के निम्नलिखित कारण हैं

( 1 ) एन . सी . ई . आर . टी . ने पर्यावरणीय शिक्षा का जो पाठ्यक्रम बनाया है , वह अति विस्तृत है ।

( 2 ) प्राथमिक स्तर के लिए जो पाठ्यक्रम बनाया गया है उसे इस स्तर के बच्चे समझने में असमर्थ हैं ।

( 3 ) एन . सी . ई . आर . टी . का कार्य तो सरकार की नीतियों के अनुपालन में लम्बे – चौड़े कार्यक्रम बनाना है , वहाँ बैठे विद्वान बच्चों के मानसिक स्तर को सामने रखने के स्थान पर सरकार के निर्णयों को सामने रखते हैं ।

समस्या का समाधान – हमारी सम्मति में इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए

( 1 ) पर्यावरणीय शिक्षा को स्कूली शिक्षा का अलग से विषय न बनाया जाए , इसे भाषा , भूगोल , अर्थशास्त्र और विज्ञान विषयों के साथ जोड़ा जाए ।

( 2 ) किसी भी विषय के साथ पर्यावरण से सम्बन्धित विषय – सामग्री को इस प्रकार जोड़ा जाए कि उस विषय । का मूलरूप प्रभावित न हो ।

( 3 ) उच्च शिक्षा स्तर पर इसे एक विशिष्ट पर ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाया जाए और इसका विस्तृत । पाठयक्रम तैयार किया जाए जिसमे प्रदूषण कम करने की वैज्ञानिक विधियाँ भी शामिल हों ।

( iii ) पर्यावरणीय शिक्षा कब शुरू करने की समस्या

समस्या का स्वरूप – कुछ विद्वान इसे प्राथमिक स्तर से शुरू करना चाहते हैं , कुछ माध्यमिक स्तर से और । मत है कि इसे स्कूली शिक्षा का अंग बनाने की कोई आवश्यकता नहीं , इसे जनचेतना के रूप में जागृत । करना चाहिए ।

समस्या के कारण – इस समस्या के निम्नलिखित कारण है

( 1 ) मनोवैज्ञानिकों का मत है कि किसी भी प्रकार के ज्ञान और अभिवृत्ति के विकास के लिए बाल्यकाल सबसे अधिक उपयुक्त काल है ।

( 2 ) दूसरी तरफ विद्वानों का तर्क है कि प्राथमिक स्तर के बच्चे इसकी विषय – सामग्री को समझने योग्य नहीं होते , अत : इसकी शिक्षा की शुरुआत माध्यमिक स्तर पर की जाए ।

( 3 ) कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि इसके ज्ञान की आवश्यकता नहीं , इसकी रोकथाम की आवश्यकता _ _ है जो सरकारी नियम एवं कानून द्वारा ही सम्भव है ।

समस्या का समाधान – हमारी सम्मति में इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित उपाए किए जाने चाहिए

( 1 ) पर्यावरण का सम्बन्ध मनुष्य के जीवन से होता है , पैदा होते ही वह पर्यावरण के सम्पर्क में आता है , अत : इसका ज्ञान उसे प्रारम्भ से ही करना चाहिए और इस दृष्टि से इसकी शिक्षा प्राथमिक स्तर से ही शुरू की जानी चाहिए ।

( 2 ) प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम में पर्यावरण सम्बन्धी सामान्य जानकारी अवश्य दी जाए , उन्हें पर्यावरण प्रदूषण के दुष्परिणामों से सचेत किया जाए और साथ ही , पर्यावरण सुरक्षा की ओर अग्रसर किया जाए ।

( iii ) पर्यावरणीय शिक्षा कैसे दी जाए की समस्या

समस्या का स्वरूप – कुछ विद्वान इसे अन्य स्कूली विषयों की तरह पढ़ाने के पक्ष में हैं और कुछ विद्वान इसे जनचेतना के रूप में जागृत करने के पक्ष में हैं । एन . सी . ई . आर . टी . ने तो पर्यावरणीय शिक्षा की विषय सामग्री और उसके शिक्षण की विधियों का अलग से विकास किया है ।

समस्या के कारण – इस समस्या के निम्नलिखित कारण हैं

( 1 ) प्रौढ़ शिक्षा के लिए अनेक उत्तम शिक्षण विधियों का विकास हो चुका है , प्रौढ़ों को उन्हीं विधियों से पर्यावरणीय शिक्षा सम्बन्धी सामान्य जानकारी दी जाए ।

( 2 ) आज सभी साक्षर एवं निरक्षर टेलीविजन देखते हैं , अत : टेलीविजन द्वारा इसकी शिक्षा दी जाए । साक्षर लोग तो समाचार पत्र – पत्रिकाएँ भी पढ़ते हैं , अत : इस माध्यम का भी प्रयोग किया जाए ।

( 3 ) इस समय देश में शिक्षा के क्षेत्र में अनेक नारे बुलन्द हैं — मूल्य शिक्षा का , जनसंख्या शिक्षा का , राष्ट्रीय एकता की शिक्षा का और पर्यावरणीय शिक्षा का । इन सबको जीवन के अभिन्न रूप में लेना चाहिए और उन्हें जीवन से जोड़कर विकसित करना चाहिए ।

निष्कर्ष – इसमें दो मत नहीं कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और प्रकृति प्रदूषण को रोकने में पर्यावरणीय या कारगर साबित हो सकती हैं परन्तु तभी जब तत्सम्बन्धी ज्ञान का जीवन में प्रयोग किया जाए । अत : आवश्यक । पर्यावरणीय शिक्षा के साथ – साथ पर्यावरण सम्बन्धी कानूनों का कठोरता से पालन किया जाए । अभी हाल में । ली में सप्रीम कोर्ट के निर्णय के आधार पर पुराने वाहनों को सड़कों पर चलाने का निषेध कर दिआय गया था , सामने हैं , वाहनों से होने वाला प्रदूषण कम हुआ है । अत : सरकार को चाहिए कि वह अपने बने हुए नियमों कटोरता से पालन कराए , ज्ञान आर कारया दाना एक साथ चलने चाहिए ।

पर्यावरण शिक्षा की विधियाँ

शिक्षा वास्तव में सामान्य शिक्षा का एक अंग मात्र है जो छात्रों में पर्यावरण के प्रति सजगता उत्पन्न | का प्रदूषित न होने देने की अभिवत्ति उत्पन्न करता है कि तथा पर्यावरण में सुधार करने की विधियों का ज्ञान कराता है । कराता है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पर्यावरण शिक्षा के अंतर्गत पयावरण स सम्बान्धत पाठ्यवस्तु की शिक्षा क्षिा प्रदान की जाती है । क्योंकि पर्यावरण शिक्षा सामान्य शिक्षा की ही एक शाखा है इसलिए पर्यावरण शिक्षा । की विधि वाषया सामान्य शिक्षा प्रदान करने की विधियों से भिन्न नहीं हो सकती है । वस्तुतः पर्यावरण शिक्षा के लिए उन्हीं विधियों का प्रयोग किया जबाग किया जाता है जिन्हें सामान्य शिक्षा के लिए प्रयक्त किया जाता है परन्तु यहा इस बात पर ध्यान हा कि पयावरण शिक्षा की विषयवस्त की प्रकति अपेक्षाकत व्यापक होने के कारण पर्यावरण शिक्षा में व्याख्या मानक स्थान पर अन्य अनभवजनित विधियों पर अधिक जोर दिया जाता है । व्याख्यान विधि का उपयोग छात्रों को पयावरण , पर्यावरण प्रदूषण , पर्यावरण संरक्षण तथा पर्यावरण सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करने के लिए किया जाता है परन्त । छात्रा म समझ उत्पन्न करने , चितंन को जागत करने . उनमें सजगता उत्पन्न करने , आदत निर्माण करने , तथा कोशल विकसित करने ऐसे उद्देश्यों के लिए वाद – विवाद , पर्यटन , प्रोजेक्ट आदि विधियों का प्रयोग अधिक उपयुक्त माना जाता है । पर्यावरण शिक्षा की प्रमुख विधियों को आगे संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है

1 . व्याख्या विधि ( Lecture Method ) – इस विधि में पर्यावरण से सम्बन्धित किसी प्रकरण अथवा समस्या पर अध्यापक अथवा वक्ता व्याख्यान के रूप में विषयवस्तु प्रस्तुत करात है । छात्र अथवा श्रोतागण उस व्याख्यान को सुनकर सम्बन्धित प्रकरण , समस्या के विभिन्न पक्षों के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं । उच्चस्तरीय छात्रों तथा प्रौढ़ व्यक्तियों को पर्यावरण शिक्षा प्रदान करने के लिए यह एक उपयोगी , प्रभावी तथा मितव्ययी विधि है ।

2 . वाद – विवाद विधि ( Discussion Method ) – वाद – विवाद विधि में किसी प्रकरण अथवा समस्या पर विचार विमर्श करके उसके विभिन्न पक्षों को स्पष्ट किया जाता है । वाद – विवाद में व्यक्तियों के कम से कम दो पक्ष होते हैं जो किसी प्रकरण अथवा समस्या पर अपने – अपने विचार प्रस्तुत करते हैं तथा प्रमाणों , तर्कों को प्रस्तुत करके अपनी बात की स्वीकृति कराने का प्रयास करते हैं । प्रदूषण समस्या , पर्यावरण एवं विकास प्रक्रिया , जनसंख्या समस्या , आधुनिकीकरण की प्रक्रिया जैसे प्रकरणों पर वाद – विवाद का आयोजन किया जा सकता है । जटिल बातों को स्पष्ट रूप से समझाने व उनका अवबोध कराने में यह विधि अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है । वाद – विवाद से अस्पष्टता समाप्त हो जाती है तथा प्रकरण के विभिन्न अंक स्पष्ट रूप से समझ में आ जाते हैं ।

3 . प्रोजेक्ट विधि ( Project Method ) – प्रोजेक्ट विधि करके सीखने के सिद्धान्त पर आधारित एक विधि है । जब छात्रों को किसी प्रकरण का विस्तार से अध्ययन कराना होता है तब प्रोजेक्ट विधि का प्रयोग किया जा सकता है । इस विधि में व्यक्तियों / छात्रों को कुछ छोटे – छोटे समूहों में बाँट दिया जाता है तथा प्रत्येक समूह को एक प्रोजेक्ट पूरा करने का उत्तरदायित्व सौंप दिया जाता है । जैसे किसी समूह को पास में निर्माणाधीन कारखानेका प्रोजेक्ट देकर कहा जा सकता है कि वह कारखाने के फलस्वरूप होने वाले प्रभावों का अध्ययन करे । अध्ययन में वायु प्रदूषण , जल प्रदूषण , मृदा प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण तथा सामाजिक प्रदूषण व इन्हें रोकने के उपायों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है ।

4 . पर्यटन विधि ( Excursion Method ) – पर्यावरण शिक्षा जैसे विषय को पढ़ाने के लिए पर्यटन विधि एक प्रभावशाली शिक्षण विधि है । किसी स्थान विशेष के पर्यावरण तथा उसके प्रदूषण का अध्ययन करने के लिए शैक्षिक पर्यटन का आयोजन किया जा सकता है । पर्यटन के द्वारा स्वयं अपने अनभव के द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं । कल कारखानों , नगरीकरण , बाँध निर्माण , सड़क निर्माण आदि के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से जानने के लिए पर्यटन का आयोजन किया जा सकता है । प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न संस्थाओं अथवा कारखानों द्वारा किये जा रहे उपायों के अध्ययन के लिए भी पर्यटन का आयोजन किया जा सकता है ।

5. वाह्य अध्ययन विधि ( Out – door Study Method ) – वाह्य अध्ययन स तात्पर्य छात्रों को विद्यालयों की पारस्थातया स निकाल कर प्रकृति की गोद में ले जाकर अध्ययन कराना है । जैसे नदी , गुफा , पहाड़ , जंगल . रागस्तान , गाव आदि पर्यावरण के अध्ययन के लिए ले जाया जा सकता है । वाह्य अध्ययन के निर्धारण के साथ साथ वाह्य अध्ययन के पूर्ण कार्यक्रमों को सावधानी पूर्वक तैयार किया जाता है जिससे छात्र वाह्य अध्ययन की अवधि में वांछित अवलोकन कर सकें ।

6 . प्रदर्शनी विधि ( Exhibition Method ) – जनसाधारण को पर्यावरण शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रदर्शनियों का प्रयोग किया जा सकता है । जैसे – वन्य जीवन से सम्बन्धित प्रदर्शनी का आयोजन करके वन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों के जीवन – चक्र तथा एक दूसरे पर निर्भरता को बताया जा सकता है । इसी प्रकार से नगरीकरण जनसंख्या वृद्धि आदि के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को चित्रों की सहायता से प्रदर्शित किया जा सकता है । इलाहाबाद में प्रतिवर्ष लगने वाले माघ मेले में तथा कुंभ व अर्द्धकुम्भ के अवसर पर जल प्रदूषण के बारे में जनसाधारण को अवगत कराने के लिए प्रदर्शनियाँ एक सशक्त तथा महत्वपूर्ण माध्यम हैं जिसके द्वारा विभिन्न प्रकरणों का ज्ञान रोचक व सरल ढंग से शिक्षित तथा अशिक्षित सभी को कराया जा सकता है ।

7 . खेल विधि ( Play Method ) – छोटे बच्चों की शिक्षा प्रदान करने में खेल महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते है । पर्यावरण शिक्षा हेतु भी इस विधि का उपयोग किया जा सकता है । खेलों के माध्यम से छात्रों में स्वयं निर्णय लेने की योग्यता के साथ – साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति सकारात्मक अभिवृत्तियों का निर्माण किया जा सकता है ।

पर्यावरण की संस्थायें

पर्यावरण तथा उसके संरक्षण का सम्बन्ध सभी से है । यही कारण है कि पर्यावरण शिक्षा का उत्तरदायित्व किसी एक पर नहीं छोड़ा जा सकता । स्थानीय संस्थायें , राज्य संस्थायें , राष्ट्रीय संस्थायें तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें सभी को एक दिशा में मिल – जुलकर काम करना होगा । नगरपालिका में , नगरनिगम , जिलापरिषद , कल – कारखाने , उद्योग विभाग , स्कूल कॉलेजों व विश्वविद्यालयों , जनसंचार साधनों , समाचार पत्र , पत्रिकायें , रेडियो , दूरदर्शन , फिल्म आदि सभी के योगदान से पर्यावरण शिक्षा का प्रचार व प्रसार सम्भव है ।

जनसंख्या विस्फोट तथा औद्योगीकर के कारण मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अंधाधुंध किया है । परिणामत : जल प्रदूषण , वायु प्रदूषण , मृदा प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण आदि समस्यायें उत्पन्न हो गई हैं । प्राकृतिक संतुलन में व्यवधान आने लगा है । अगर प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया तब मानव जाति जीवित नहीं रह सकती । प्राकृतिक संतलन में हो रहे व्यवधान के फलस्वरूप मानव जीवन एक दोराहे पर आकर खड़ा हो गया है । वस्तुतः प्रकृति का संरक्षण करना हम सभी का न केवल एक पुनीत कर्तव्य है वरन् अस्तित्व हेतु एक आवश्यकता है । आज पर्यावरण की समस्या एक ज्वलंत समस्या बन गई है । इस समस्या का निराकरण करने के लिए गम्भीर प्रयास की आवश्यकता है । पर्यावरण की रक्षा तथा उसमें सधार के लिए आवश्यक माहौल तैयार करने के लिए पर्यावरण शिक्षा पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक । है । जन समदाय की पर्यावरण के प्रति सजगता को बढ़ाने के लिए प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस ironment Day ) मनाया जाता है । इस दिन गोष्ठियों का आयोजन करके , रैलियों को निकालकर तथा m करके पर्यावरण को बचाने के प्रयासों की आवश्यकता की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया जाता है एवं इस दिशा में प्रयास करने के संकल्प किये जाते हैं । वस्तुतः पर्यावरण की रक्षा करना सबका एक पुनीत कर्तव्य है । ।

By Alok Verma

बाल विकास की अवस्थाएँ

बाल विकास की अवस्थाएँ

( Stages of Child Development )

बाल विकास की प्रक्रिया को विभिन्न अवस्थाओं में बाँटा जा सकता है विभिन्न विद्वानों ने विकास की अवस्थाओं को अलग – अलग प्रकार से वर्गीकृत किया है ।

यह अवस्थाएँ निम्नलिखित है

1 रॉस के अनुसार विकास की अवस्थाएँ

1 . शैशवावस्था ( Infancy ) जन्म से 5 या 6 वर्ष तक ।

2 . बाल्यावस्था ( Childhood ) – 5 या 6 वर्ष से 12 वर्ष तक ।

3 . किशोरावस्था ( Adolescence ) – 12 वर्ष से 18 वर्ष तक ।

4 . प्रौढावस्था ( Adulthood ) – 18 वर्ष के पश्चात् । ।

II हरलॉक ( 1990 ) द्वारा वर्णित विकास अवस्थाएँ इस प्रकार हैं

1 . गर्भकालीन अवस्था ( Prenatal Period ) – गर्भधारण से जन्म तक ।

2 . शैशवावस्था ( Infaney ) – जन्म से चौदह दिनों की अवस्था तक ।

3 . बचपनावस्था ( Babyhood ) – दो सप्ताह के बाद से दो वर्ष तक ।

4 . पूर्व बाल्यावस्था ( Early Childhood ) – तीन वर्ष से छः वर्ष तक ।

5 . उत्तर बाल्यावस्था ( Late Childhood ) – छ से चौदह वर्ष तक ।

6. वयः सन्धि या पूर्व किशोरावस्था ( Puberty ) – ग्यारह से 17 वर्ष तक ।

7 . किशोरावस्था ( Adolescence ) – सत्रह से इक्कीस वर्ष तक ।

8 . प्रौढ़ावस्था ( Adulthood ) – इक्कीस से चालीस वर्ष तक ।

III . कोल ( Cole ) ने विकास की अवस्थाओं का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया है

1 . शैशवावस्था ( Infancy ) – जन्म से लेकर दो वर्ष तक ।

2 . प्रारम्भिक बाल्यावस्था ( Early Childhood ) – 2 से 5 तक ।

3 . मध्य बाल्यावस्था ( Middle Childhood ) – बालक 6 से 12 तथा बालिका 6 से 101

4 , पूर्व किशोरावस्था या उत्तर बाल्यावस्था ( Pre Adole – scence or Late Childhood ) – बालक 13 से 14 तक तथा बालिका 11 से 12 तक ।

5 . प्रारम्भिक किशोरावस्था ( Early Adolescence ) – बालक 15 से 16 तक तथा बालिका 12 से 14 तक ।

6 . मध्य किशोरावस्था ( Middle Adolescence ) – बालक 17 से 18 तक तथा बालिका 15 से 17 तक ।

7 . उत्तर किशोरावस्था ( Late Adolescence ) – बालक 19 से 20 तक तथा बालिका 18 से 20 तक ।

8 . प्रारम्भिक प्रौढ़ावस्था ( Early Adulthood ) – 21 से 37 तक ।

9 . मध्य प्रौढ़ावस्था ( Middle Adulthood ) – 35 से 49 तक ।

10 . उत्तर प्रौढ़ावस्था ( LateAdulthood ) – 50 से 64 तक ।

11 . प्रारम्भिक वृद्धावस्था ( Early Senescence ) – 65 से 74 तक ।

12 . वृद्धावस्था ( Senescence ) – 75 से आगे ।

कुछ प्रमुख विकास की अवस्थाओं का वर्णन इस प्रकार है

1 . गर्भकालीन अवस्था ( Prenatal Period ) – यह गर्भधारण से जन्म तक V की अवस्था है । इस अवस्था की विकास प्रक्रियाओं के अध्ययन की । सुविधा की दृष्टि से इस अवस्था की तीन उप – अवस्थाएँ हैं

( i )बीजावस्था ( Germinal Period ) यह गर्भधारण से दो सप्ताह तक की अवस्था है ।

( ii ) भ्रूणावस्था ( Embryonic Period ) – यह दो से 18 सप्ताह तक की प्रक्रिया है । इस अवस्था का जीव भ्रूण कहलाता है । इस अवस्था में । मुख्य – मुख्य अंगों का निर्माण होता है । ।

( iii ) गर्भावस्था शिशु की अवस्था ( Period of the Fetus ) – यह आठ सप्ताह से जन्म से पूर्व तक की अवस्था होती है ।
2 . प्रौशवावस्था ( Infancy ) यह जन्म स चादह दिनों की अवस्था है । इस अवस्था में शिश को नवजात शिशु ( New Born Neonate ) कहते है

  • इस अवस्था में बालक को अनेक प्रकार की क्रियाएं जैसे – चूसना . – निगलना , श्वसन , उत्सर्जन इत्यादि करनी पड़ती है ।

3. बचपनावस्था ( Rabvhood ) – यह अवस्था दो सप्ताह से दो वर्ष तक की अवस्था है । इस अवस्था में बालक पूर्णत : असहाय होता है और अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर होता है , परन्तु इस अवस्था में । विकास की गति तीव्र होती है ।

4 . बाल्यावस्था ( Childhood ) – यह अवस्था तीन वर्ष के प्रारम्भ से तेरह चौदह वर्ष तक की अवस्था है ।

इस अवस्था को अध्ययन की सुविधा हेतु दो भागों में बाँटा गया है -( i )पूर्वबाल्यावस्था , ( i ) उत्तरबाल्यावस्था ।

  • बालक में नवीन प्रवृत्तियाँ , जिज्ञासा , सृजनशीलता , अनुकरण इत्यादि का उदय होने लगता है ।
  • बालक प्रथम बार अकेले सामाजिक वातावरण में प्रवेश करता है और वह विद्यालय जाना प्रारम्भ कर देता है । इस अवस्था में बालक की खिलौनों में रुचि बढ़ जाती है । इस कारण इस उम्र को खिलौनों की उम्र भी कहा जाता है ।
  • इस अवस्था में बालक मित्रमण्डली में रहना ( Group or team ) पसन्द करता है ।

5 . वयः सन्धि या पूर्व किशोरावस्था ( Puberty ) – इसका कुछ भाग उत्तर बाल्यावस्था और कुछ भाग किशोरावस्था में पड़ता है । लगभग दो वर्ष उत्तर बाल्यावस्था और दो वर्ष किशोरावस्था में पड़ते हैं । इसलिए इस अवस्था को ( Overlapping Period ) कहा गया है । इस अवस्था में मुख्यत : यौन अंगों का विकास होता है । शारीरिक और मानसिक विकास की गति इस अवस्था में बाल्यावस्था से तीव्र रहती है ।

6 . किशोरावस्था ( Adolescence ) – बाल जीवन की यह अन्तिम अवस्था है । यह 14 – 15 वर्ष से लगभग 21 वर्ष तक की अवस्था है । लगभग 17 वर्ष तक की अवस्था पूर्व किशोरावस्था कहलाती है तथा इसके बाद की अवस्था उत्तर किशोरावस्था कहलाती है । कुछ लोग इस अवस्था को स्वर्ण आयु ( Golden Age ) भी कहते हैं ।

  • इस अवस्था में विपरीत सेक्स के लोगों के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है तथा सामाजिकता और कामुकता इस अवस्था की दो मुख्य विशेषताएँ हैं , जिनसे सम्बन्धित अनेक परिवर्तन बालक – बालिकाओं में इस अवस्था में होते हैं ।

7 . प्रौढ़ावस्था ( Adulthood ) यह इक्कीस से चालीस वर्ष तक की अवस्था है । इसमें कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर सकता है । जन जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में उसका स्वस्थ समायोजन हो । स्वस्थ समायोजन की ही अवस्था में वह उपलब्धियों को प्राप्त कर सकता है ।

8 . मध्यावस्था , उत्तर मध्यावस्था ( Middle , Late Adult – hood ) यह अवस्था 41 से 64 वर्ष तक की अवस्था है । इस अवस्था में व्यक्ति के अन्दर शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं । इस समय व्यक्ति सुखमय एवं सम्मानजनक जीवन की कामना करता है ।

9. वृद्धावस्था ( Senescence ) – यह अवस्था 65 वर्ष के आगे की अवस्था कहलाती है । यह जीवन की अतिम अवस्था के रूप में जानी जाती है । इस अवस्था में याददाश्त कमजोर पड़ जाती है । इस अवस्था में शारीरिक व मानसिक क्षमताओं में कमी आने लगती है ।

By Alok Verma

बाल विकास के क्षेत्र

बाल विकास के क्षेत्र

( Scopes of Child Development )
बाल विकास का क्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत और व्यापक है । यह बालक के विकास के सभी आयामों , स्वरूपों , असामान्यताओं , शारीरिक व मानसिक परिवर्तनों तथा उनको प्रभावित करने वाले तत्वों ; जैसे परिपक्वता और शिक्षण , वंशानुक्रम और वातावरण आदि सभी का अध्ययन करता है । वर्तमान समय में यह इतना अधिक महत्वपूर्ण विषय हो गया है कि दिनों दिन इसका विस्तार बढ़ता जा रहा है । बाल विकास के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों को सम्मिलित किया जाता है

1 . बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन ( Study of Various Stages of Development ) – प्राणी के जीवन प्रसार में अनेकों अवस्थायें होती हैं । जैसे – गर्भकालीन अवस्था , शैशवावस्था , बचपनावस्था , बाल्यावस्था , वयःसंधि और किशोरावस्था । बाल विकास केवल बाल्यावस्था का ही अध्ययन नहीं करता अपितु विकास क्रम की सभी अवस्थाओं के शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , संवेगात्मक , बौद्धिक आदि सभी पहलुओं का अध्ययन करता है ।

2 . बाल विकास के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन ( Study of Various Aspects of Child Development ) – बाल विकास , विकास के किसी एक ही क्षेत्र से सम्बन्धित नहीं होता है । इसके अन्तर्गत विकास के विभिन्न पहलओं , जैसे – शारीरिक विकास , मानसिक विकास , संवेगात्मक विकास सामाजिक विकास , क्रियात्मक विकास , भाषा विकास , नैतिक विकास चारित्रिक विकास और व्यक्तित्व विकास सभी का विस्तारपूर्वक अध्ययन किया जाता है ।

3 . बालकों की विभिन्न असामान्यताओं का अध्ययन ( Study of Various Abnormalities of Children ) – बाल विकास के अन्तर्गत केवल सामान्य बालकों के विकास का ही अध्ययन नहीं किया जाता बल्कि बालकों के जीवन विकास क्रम में होने वाली असामान्यताओं और विकृतियों का भी अध्ययन किया जाता है । बाल विकास , असन्तुलित । व्यवहारों , मानसिक विकारों , बौद्धिक दुर्बलताओं तथा बाल अपराधों के । कारणों को जानने का प्रयास करता है और निराकरण हेतु उपाय भी बताता है ।

4 . मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अध्ययन ( Study of Mental Hygiene ) – बाल विकास केवल मानसिक दुर्बलताओं और रोगों का ही अध्ययन नहीं करता बल्कि विभिन्न मनोवैज्ञानिक तरीकों से उनके उपचार भी प्रस्तुत करता है । मनोचिकित्सा बाल मनोविज्ञान और बाल विकास की ही देन है ।

5 . बालकों की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन ( Study ofVarious Mental Processes of Children ) – बाल विकास बालकों के बौद्धिक विकास की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं ; जैसे – अधिगम , कल्पना , चिन्तन , तर्क , स्मृति तथा प्रत्यक्षीकरण आदि का अध्ययन करता है । बाल विकास यह जानने का प्रयास करता है कि विभिन्न आयु स्तरों में इन मानसिक प्रक्रियायें किस रूप में पायी जाती हैं और इनके विकास की । गति क्या होती है ? इसी के आधार पर मानसिक प्रक्रियाओं का विकास किया जाता है ।

6 . बालकों की वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन ( Study of Individual Differences of Children ) – यद्यपि सभी आयु स्तरों पर विकास का एक निश्चित प्रतिरूप होता है लेकिन फिर भी प्रत्येक क्षेत्र में सभी . बालकों का विकास समान नहीं होता है । शारीरिक विकास में कुछ बालक अधिक लम्बे , कुछ नाटे तथा कुछ सामान्य लम्बाई के होते हैं । इसी प्रकार मानसिक विकास में भी कुछ प्रतिभाशाली , कुछ सामान्य और कुछ मन्द बुद्धि होते है । इसी प्रकार कुछ बालक सामाजिक तथा बहिर्मुखी होते हैं जबकि कुछ अन्तर्मुखी । अतः विकास के सभी क्षेत्रों में व्यक्तिगत भिन्नता पायी जाती है । बाल विकास वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन कर उन कारणों को जानने का प्रयास करता है , जिससे सामान्य विकास प्रभावित हुआ है ।

7 . बालकों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन ( Assessment of Children Personality ) – बाल विकास के अन्तर्गत बालकों की विभिन्न शारीरिक और मानसिक योग्यताओं का मापन व मूल्यांकन किया जाता है । योग्यताओं के मापन व मूल्याकन के लिये बाल विकास के क्षेत्र में मनोवैज्ञानिकों द्वारा नित नये वैज्ञानिक तथा प्रमापीकृत परीक्षणों का निर्माण किया जाता है । ये परीक्षण विभिन्न आयु – स्तरों पर बालकों की योग्यताओं का मापन कर उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते हैं ।

8 . बालकों की रुचियों का अध्ययन ( Study of Childhood Interests ) – बाल विकास बालकों की रुचियों का अध्ययन कर उन्हें । शैक्षिक और व्यावसायिक निर्देशन प्रदान करता है । रुचियाँ एक अर्जित व्यवहार है जो जन्मजात नहीं होती हैं बल्कि सीखी जाती हैं । रुचियाँ । कार्य की प्रगति में प्रेरणा का कार्य करती हैं और लक्ष्य की पूर्ति को आसान बनाती हैं | यदि बालक को किसी कार्य में रुचि होती है तो वह । उसे शीघ्रता से अधिक मनोयोग के साथ पूरा कर लेता है । ।
By Alok Verma