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बाल विकास की आवश्यकता

बाल विकास की आवश्यकता

( Need of Child Development )

यह सदैव जिज्ञासा का विषय रहा कि अध्यापन विज्ञान में पढ़ने – पढ़ाने की तकनीक के अलावा बाल मनोविज्ञान का अध्ययन क्यों किया जाता रहा है । बाल मनोविज्ञान का अध्ययन शिक्षक करता है । शिक्षक बाल मनोविज्ञान का अध्ययन इसलिए करता है कि उसे यह पता चल सके कि जिसके लिये | वह सम्पूर्ण अध्ययन अध्यवसाय कर रहा है , वह कितना ग्रहण कर रहा है और कितना ग्रहण करने की क्षमता रखता है , ताकि उसकी क्षमतव ज्ञान । उपयोग की दक्षता के अनुसार अध्ययन कर सके ।

बाल विकास अध्यापकों के लिये निम्न प्रकार आवश्यक है ।

1 . बालकों की मनोरचना की जानकारी प्राप्त करने हेत – सार्वभौम का कोई भी प्राणी पूर्णतः एक समान नहीं होता है । ठीक उसी प्रकार कोई भी दो बालक एक प्रकार नहीं होते सभी की मनोरचना , मस्तिष्क रचना भिन्न – भिन्न प्रकार की होती है । लेकिन अध्यापक को यह सुविधा नहीं प्राप्त है कि प्रत्येक बालक को अलग – अलग उसकी मनोरचना के अनुसार शिक्षा प्रदान करें । अधिकांश सामूहिक रूप में कक्षाओं में अध्यापन करना पड़ता है , यद्यपि कि सामूहिक कक्षाओं में भी बालक की वैयक्तिक भिन्नता को समाप्त नहीं किया जा सकता है । ऐसी दशा में शिक्षक मनोविज्ञान का अध्ययन करके अध्यापन की एक सर्व उपयोगी पद्धति की जानकारी प्राप्त करके शिक्षण करता है ताकि सभी छात्रों को उसका लाभ मिल सके । बच्चों के मस्तिष्क रचना की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करता है ।

2 . बाल विकास प्रक्रिया को समझाने में सहायक प्रत्येक बालक का विकास अपने अनुसार विभिन्न नियमों व सिद्धान्तों के अनुसार होता है । प्रत्येक बालक का विकास व्यक्तिगत रूप से होता है तथा विशिष्ट व्यवहार करता है तथा क्षमताओं को ग्रहण करता है । बाल विकास के अध्ययन से अपना शिक्षण विकास प्रक्रिया क्षमताओं का प्रयोग बालक के अधिगम व क्षमता समर्थन के अनुरूप करेगा ।

3 . बाल निर्देशन व परामर्श में सहायक – बाल मनोविज्ञान के अध्ययन से शिक्षक छात्र की क्षमताओं व रुचियों का ज्ञान प्राप्त करके तदनुसार आगे की पढ़ाई करने तथा व्यवसाय मार्ग व अध्ययन तथा अभिभावक को देता है । इससे छात्र के भकटने तथा समय व श्रम के अपव्यय होने की सम्भावना नहीं रहती है ।

4 . बालकों के प्रति भविष्यवाणी करने में सहायक – बाल मनोविज्ञान के जानकार शिक्षक बाल मनोविज्ञान का अध्ययन करके उसके भविष्य के प्रति अनुमान लगाकर कथन कर सकता है , जिससे छात्रों के व्यवसाय चयन में आसानी होती है ।

5 . बाल व्यवहार का मार्गान्तरीकरण व नियन्त्रण में सहायक – कभी – कभी छात्र ऐसा व्यवहार करता है जो बालक व समाज के प्रति अच्छा नहीं होता , वह व्यवहार इतना प्रगाढ़ हो जाता है जिसे पूर्णतयः समाप्त करना सम्भव नहीं होता , ऐसी दशा में बालक के व्यवहार व्यवहरण की दिशा । बदल कर उसको रचनात्मक बनाया जा सकता है । बाल मनोविज्ञान के अध्ययन से शिक्षक के अन्दर ऐसा कौशल आ जाता है और वह बाल व्यवहार पर नियन्त्रण कर सकता है ।

6 . व्यक्तिगत भिन्नता का ज्ञान – विश्व के कोई भी दो प्राणी पूर्णतया ( सर्वांग ) एक समान नहीं होते हैं । कुछ न कुछ भिन्नता अवश्य रहता ह ऐसी दशा में उन भिन्नताओं की शैक्षिक योजना करना सामान्य शिक्षक रा काठन होता है । बाल मनोविज्ञान का ज्ञाता शिक्षक वैयक्तिक भिन्नताओं को जानकर तदनसार अपने शिक्षण कौशल की योजना बनाकर सभी छात्रों को लाभ पहुंचाता है ।

7 . कक्षा में शिक्षण व अधिगम का वातावरण बनाने में सहायक – बाल मनोविज्ञान के ज्ञान से शिक्षक यह जान पाने में समर्थ होता है कि कक्षा । में कब तथा क्या पढ़ाया जाये , जिसे सभी छात्र रुचिपूर्वक सीख सके । इससे अध्यापक कक्षा में अधिगम व शिक्षण का वातावरण सृजित कर अपने शिक्षण के माध्यम से पाठ्यवस्तु को छात्रों तक पहुँचाने में सफल होता है । कब , क्या और कैसे पढ़ाया जाये इसका ज्ञान बाल मनोविज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है ।

8 . अनुशासन स्थापन में सहायक – कक्षा में अनुशासन स्थापन भी शिक्षण कौशल की एक कला है । अब अनुशासन स्थापना हेतु डाँट – फटकार , शारीरिक दण्ड व मानसिक प्रताड़ना की अवधारणा को नकार दिया गया है , क्योंकि कक्षा के सभी छात्रों को दण्ड देकर अनुशासित करना सम्भव भी नहीं है । ऐसी दशा में मनोविज्ञान के प्रभाव से कक्षा में अनुशासन स्थापित किया जा सकता है , जो शिक्षक द्वारा मनोविज्ञान के ज्ञान से ही सम्भव है ।

9 . विशिष्ट बालकों के शिक्षण में सहायक – कक्षा में शारीरिक व मानसिक रूप से सभी बालक एक स्तर के नहीं होते हैं । इनमें कुछ शारीरिक व मानसिक रूप से ( बुद्धिलब्धि की दृष्टि से ) कम या ज्यादा होते हैं , कभी – कभी तो इतना अन्तर हो जाता है कि सभी को एक साथ एक कक्षा में बैठाकर शिक्षण करना सम्भव नहीं होता । ऐसी दशा में बाल मनोविज्ञान का ज्ञाता शिक्षक शिक्षण में समायोजन करके विशिष्ट बालकों की आवश्यकतानुसार शिक्षण उद्यम करता है ।

10 . बाल मनोविज्ञान का ज्ञाता शिक्षक ही एक सफल शिक्षक बन सकता है । क्योंकि शिक्षण के दौरान अनेक अवसर आते हैं जब भौतिक व्यवस्था असफल हो जाती है , तब मनोविज्ञान ही एक ऐसा विषय अध्ययन है जो शिक्षक को नियन्त्रण करने की क्षमता प्रदान करती है ।
By Alok Verma

बाल विकास का अर्थ

विकास का अर्थ

( Meaning of Child Development )

बाल विकास ‘ से तात्पर्य बालकों के सर्वांगीण विकास से है । बाल का अध्ययन करने के लिये ‘ विकासात्मक मनोविज्ञान की एक अलग बनाई गयी जो बालको के व्यवहारों का अध्ययन गर्भावस्था से लेकर मृतुपर्यन्त तक करती है । परन्तु वर्तमान समय में इसे बाल विकास ‘ ( Child Development ) Melopment ) में परिवर्तित कर दिया गया क्योकि बाल मनोविज्ञान में केवल बालकों के व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है जबकि बाल विकास के अन्तर्गत उन सभी तथ्यों का अध्ययन किया जाता है बालकों के विकास , ( ii ) व्यवहार , ( iii ) विकास को प्रभावित करने वाले विभिन्न तत्वों का अध्ययन करती है जो बालकों के व्यवहारों को एक निश्चित दिशा प्रदान कर विकास में सहायता प्रदान करते हैं ।

‘ हरलॉक ‘ ( Hurlock ) ने इस सम्बन्ध में कहा है कि ” बाल मनोविज्ञान का नाम बाल विकास इसलिये बदला गया क्योंकि अब बालक के विकास के समस्त पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है , किसी एक पक्ष पर नहीं ।

बाल विकास के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने अपने अलग – अलग मत दिये हैं

क्रो एण्ड क्रो के अनुसार – “ बाल विकास वह विज्ञान है जो बालक के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से मृत्युपर्यन्त तक करता है ।

डार्विन के अनुसार – “ बाल विकास व्यवहारों का वह विज्ञान है जो बालक के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से मृत्युपर्यन्त तक करता है ।

” हरलॉक के अनुसार – ” बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है जो गर्भाधान से लेकर मृत्युपर्यन्त तक होने वाले मनुष्य के विकास की विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है ।

” इस प्रकार उपर्यक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि बाल विकास बाल मनोविज्ञान की ही एक शाखा है जो ( i ) बालकों के विकास , ( ii ) व्यवहार , ( iii ) विकास को प्रभावित करने वाले विभिन्न तत्वों का अध्ययन करती है । बाल मनोविज्ञान तथा बाल विकास में थोड़ा – सा ही अन्तर है ।

बाल मनोविज्ञान बालक की क्षमताओं का अध्ययन करता है जबकि बाल विकास ‘ क्षमताओं के विकास की दशा ‘ का अध्ययन करता है । बाल मनोविज्ञान का उद्देश्य बाल मन तथा बाल स्वभाव को समझना होता है जैसे – बालक के भीतर कौन – सी क्षमतायें विद्यमान हैं , उसके व्यवहार प्रौढ़ों के व्यवहार से किस प्रकार भिन्न हैं , बालक की स्मरण शक्ति का विस्तार कितना है , वह किन परिस्थितियों से प्रेरणा ग्रहण करता है , उसकी कल्पनायें क्या हैं ? आदि बातो । का समझाना बाल मनोविज्ञान का उद्देश्य होता है । इसके विपरीत बाल विकास बालकों का अध्ययन इस दृष्टि से करता है कि उनका भूत आर । नावष्य वर्तमान से जुड़ा रहे और के स्वस्थ प्रौढ जीवन व्यतीत कर सका ।

By Alok Verma

वाक्य रचना

सार्थक शब्दों का वह व्यवस्थित समूह जिससे अपेक्षित अर्थ प्रकट हो वाक्या कहलाता है ।

वाक्य के प्रमुख तत्व

1 सार्थकता 2 योग्यता ,

3 आकांक्षा 4 . निकटता

5 . पदक्रम 6 अन्वय

1 सार्थकता – यह वाक्य का प्रमुख गुण है वाक्य का कुछ – न – कुछ सार्थक अर्थ अवश्य होना चाहिए ।

2 योग्यता – वाक्य में भावों का बोध कराने वाली योग्यता होनी चाहिए ।

जैसे – प्रखर बाजार का सम्मुख जा रहा है । इस वाक्य में प्रयुक्त । सभी शब्द सार्थक है , परन्तु यह वाक्य सही अर्थ नहीं दे रहा । सम्मुख शब्द सार्थक होते हुए भी वाक्य के अनुकूल नहीं है । यहीं सम्मुख शब्द के स्थान पर ओर ‘ शब्द प्रयुक्त होना चाहिए ।

3 . आकाक्षा – वाक्य स्थय में इतना पूर्ण होना चाहिए कि भाव को समझने की आवश्यकता न हो , जैसे – कोई व्यक्ति यदि कहें कि जाता है इस वाक्य में कर्ता को जानने की इच्छा होगी ।

4 . निकटता – बोलते या लिखते समय वाक्य के शब्दों में निकटता का होना आवश्यक है ।

5 . पदक्रम – वाक्य मे पदों को एक निश्चित क्रम में होना आवश्यक होता है , जैसे – जाती है प्रज्ञा शहर । इसका सही क्रम है प्रज्ञा शहर जाती है ।

6 . अन्वय – वाक्य में व्याकरण की दृष्टि से लिंग , पुरुष , वचन कारक काल आदि का क्रिया के साथ ठीक – ठीक मेल होना चाहिए ।

वाक्य के अंग ( घटक ) वाक्य के दो अग है –

1 उददेश्य 2 . विचेय

1 . उद्देश्य – वाक्य में जिसके विषय में बताया जाता है उत्ने उद्देश्य कहते हैं , जैसे श्वेता हंसती है । इसमें श्वेता के विषय में बताया गया है अतः श्वेता ‘ उददेश्य है ।

2 . विधेय – वाक्य में उद्देश्य के विषय में जो कुछ कहा जाता है उसे विधेय कहते है , जैसे – पक्ति पढ़ती है । इस वाक्य में पढ़ती है विधेय है ।

वाक्य के भेद

वाक्यों का वर्गीकरण दो आधारों पर किया जाता है

1- रचना के आधार पर

2- अर्थ के आधार पर

1 . रचना के आधार पर

( क ) सरल वाक्य

( ख ) मिश्र वाक्य

( ग ) संयुक्त वाक्य

( क ) सरल वाक्य – जिन वाक्यों में एक मुख्य क्रिया हो उन्हें सरल वाक्य कहा जाता है , जैसे

  • बच्चे पार्क में खेल रहे हैं । .
  • पिताजी पुस्तक पढ़ रहे है । .
  • सजल सो रही है । .
  • जूबी आज स्कूल नहीं गई ।

( ख ) मित्र वाक्य – वे वाक्य जिसमें साधारण वाक्य के साथ एक या एक से अधिक उपवाक्य हो , उन्हें मिश्र वाक्य कहते हैं , जैसे .

  • उसने जो परीक्षा दी ।
  • वह दसवी की थी ।
  • आश्चर्य है कि वह जीत गया ।
  • काम समाप्त हो जाए तो जा सकते हो ।
  • जब तुम लौटकर आओगे तब मैं आऊँगा ।

( ग ) संयुक्त वाक्य – जहाँ दो या दो से अधिक सरल वाक्य योजक शब्द ( अत इसलिए , तो फिर भी , किन्तु , परन्तु , लेकिन पर ) से जुड़े होते है . संयुक्त वाक्य कहलाते हैं ,

  • जैसे काम खत्म करो और जाओ ।
  • सूर्योदय हुआ और अधेरा चला गया ।
  • हमने पानी बरसता हुआ देखा और घर में शरण
  • परिश्रम करो और सफलता प्राप्त करो ।

2 . अर्थ के आधार पर

अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद है

( क ) विधानवाचक – जिस वाक्य में किसी कार्य के होने या करने की सामान्य सूचना मिलती है , उसे विधानवाचक वाक्य कहते है ।

  • राकेश दिल्ली गया ।
  • सूर्य पूरब से निकलता है ।

( ख ) निषेधवाचक – जिस वाक्य में किसी कार्य के न होने का बोध हो . उसे निषेधवाचक वाक्य कहते हैं , जैसे

  • शालू आज बनारस नहीं जाएगा ।
  • मिकू आज नहीं खेलेगा ।

( ग ) आज्ञावाचक – जिन वाक्यों से आज्ञा या अनुमति देने का बोध होता है , उन्हें आज्ञावाचक वाक्य कहते है , जैसे

  • जल्दी खाना खाओ ।
  • एक गिलास पानी लाओ ।

( घ ) प्रश्नवाचक – जिन वाक्यों में किसी प्रकार का प्रश्न पूछे जाने का बोध होता है , उसे प्रश्नवाचक वाक्य कहते हैं , जैसे

  • आकाश तुम कहाँ जा रहे हो ?
  • सतनाम तुम्हारा घर कहाँ है ?

( ङ ) विस्मयवाचक – जिस वाक्य से आश्चर्य , शोक , हर्ष , विस्मय , घृणा आदि के भाव व्यक्त हो , उन्हें विस्मयवाचक वाक्य कहते हैं , जैसे

  • अहा ! कितना सुन्दर दृश्य है ।
  • उफ ! कितनी गर्मी है ।

( च ) इच्छावाचक – जिस वाक्य में इच्छा , आशीर्वाद , शुभकामना का बोध हो , इच्छावाचक वाक्य कहलाते हैं , जैसे

  • प्रभु तुम्हें दीर्घायु प्रदान करे ।
  • ईश्वर करे आप दसवीं में प्रथम आएँ । ।

( छ ) संदेहवाचक – जिन वाक्यों में कार्य के होने या न होने में संदेह रहता है , उन्हें संदेहवाचक वाक्य कहते हैं , जैसे

  • शायद अमृत कल आए ।
  • शायद राजू आज आगरा आए ।

( ज ) संकेतवाचक – जिन वाक्यों में एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर होता है । वह सकेतवाचक वाक्य कहलाते हैं , जैसे

  • आप साथ में जाते तो इतनी मुसीबत न होती ।
  • यदि तुम दिन – रात कड़ी मेहनत करते तो पास हो जाते ।

By आलोक वर्मा

लिंग

                           लिंग 

संज्ञा के जिस रूप से पुरुष या स्त्री तत्व का बोध हो , उसे लिंग कहते हैं । हिन्दी में दो लिंग होते हैं – पुल्लिंग और स्त्रीलिंग । 


पुल्लिग – जिन शब्दों में आकारान्त शब्द हो , उसे पुल्लिंग कहते हैं , जैसे – मटका , कपड़ा , घोड़ा , आदि । • आ , आव , आपा , पन , पा आदि प्रत्यय जुड़े शब्द पुल्लिग होते हैं । जैसे – मोटापा , बुढ़ापा । • पर्वतों के नाम – अरावली , हिमालय , कैलाश । • मासों के नाम – चैत्र , आषाढ़ , मार्च , अप्रैल । • ग्रहों के नाम – तारा , ध्रुव , शनि , चन्द्र । 


स्त्रीलिंग– शब्द के जिस रूप से किसी प्राणी या वस्तु के स्त्री जाति का होने का बोध होता है , उसे स्त्रीलिंग कहते हैं , जैसे – सीता , रीता , गीता आदि । • ईकारांत शब्द स्त्रीलिंग होते हैं , जैसे – उदासी , बोली , चिट्ठी । • नदियों के नाम – गंगा , यमुना , चंबल , कावेरी ।•तिथियों के नाम – प्रथम , द्वितीय , तृतीया , चतुर्थी । • भाषाओं के नाम – गुजराती , मद्रासी , अंग्रेजी , मराठी । आई , ता , आवट आदि प्रत्यय वाली भाववाचक संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं ; जैसे – खटाई , मिठास , लिखावट , नीचता , चुभन , कृति आदि ।             By आलोक वर्मा

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